वादा

हम अब किसी के तलबगार नहीं 
तुम्हारी बेवकूफी के ज़िम्मेदार नहीं 
कभी कोई वादा नहीं किया तुमसे 
क्या करूँ गर तुम समझदार नहीं
       ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️ 

कहाँ पहुँचेगा

उठ पाए न तन  से ऊपर, वो मन तक क्या पहुँचेगा 
इक पगली बैठी सोच रही ये रिश्ता कहाँ पहुँचेगा  
उसको तन की भूख नहीं है इतना तो वो जान गयी 
क्या कोई मिल पायेगा जो उसके मन तक पहुँचेगा 

करनी और कथनी में अंतर, दिखता तो था पहले भी 
अंतर इतना साफ़ हुआ, वो दिल तक क्या पहुँचेगा 
         इक पगली बैठी सोच रही ये रिश्ता कहाँ पहुँचेगा  

कोई अपेक्षा इसको तो पहले भी नहीं थी उससे पर 
उसकी अपेक्षा बढ़ती जाए, ये इसने कब सोचा था 
        इक पगली बैठी सोच रही ये रिश्ता कहाँ पहुँचेगा  
 
जो खुद इतना उलझा है उससे मन कोई क्या सुलझेगा 
जो लेना ही लेना जाने वो देना कहाँ कब सीखेगा 
        इक पगली बैठी सोच रही ये रिश्ता कहाँ पहुँचेगा 
                                           ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️ 

बाकी है

जीवन की शाम में,उम्र के ढलान पे  
काम और इम्तिहान बाकी हैं । 
उन्हें उलझाना नहीं चाहती 
जिनके बिन रह नहीं पाऊँ 
अपने प्यार करने वालों को 
क्यों अपने साथ उलझाऊँ ?
एक इंतज़ार अब भी बाकी है 
कुछ साँस अब भी बाकी है 
समझाऊँ कैसे दिल के किसी 
कोने में अब भी आस बाकी है 
ए ज़िन्दगी ! क्या चाहती है तू 
जीना चाहो तो क्यों तड़पाती है तू 
न बदलता चाहने भर से कुछ भी 
पुरजोर कोशिशो-अंजाम बाकी है 
'मुक्त' उन्मुक्त उड़ान बाकी है-2 
       ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️ 

वक़्त

बह रहा है वक़्त अपनी गति से जान ले

अब फ़क़त तू समय की कीमत पहचान ले

कोई इन हाथों में मंज़िल नहीं देगा

कर जो करना है, अपने दिल में ठान ले

✍️ सीमा कौशिक ‘मुक्त’ ✍️

भूख

ज़िन्दगी दर्द की मानिंद भुगते हर इंसान 
सामने बेशुमार राहें न इक राह आसान  
कितना बेबस इंसान,सन्मुख तनमन की भूख  
कैसे रूह की भूख की, हो पाएगी पहचान 
       ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️ 

साफ़ हो जाता है

भरपूर प्यार जब हो दिल में 
वो साफ़ नज़र आ जाता है  
छंटे भ्रम का अँधेरा जो मन से 
सब साफ़ नज़र आ जाता है 

दावे हों चाँद को लाने के और 
छोटी सी ख़ुशी वो देते नहीं 
कुछ सवाल आपको घेरें तो 
सब साफ़ नज़र आ जाता है ----

मज़बूरियाँ आपको घेरें हों 
वादों यादों के घेरे हों  
जब आवाज़ पीछे से आती हैं  
तब कदम कहाँ उठ पाता है ---- 

जब अपने स्वार्थ में डूबें हों 
एकदूजे के लिए अजूबे हों 
जब रोज़ अहम् टकराता है 
बिखराव साफ़ हो जाता है ----

आँधी-तूफानों के सायों में 
दुखों के गलियारों में 
मायूसी के अँधियारों में 
अपना-गैर साफ़ हो जाता है ----

जब सारे सहारे छिन जाएँ 
कोई तुमको न अपनाये 
तब खुद की पनाह में जाने से 
हर रास्ता साफ़ हो जाता है ----
        ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️

भारतीय नारी

     पता नहीं भारतीय नारी में दम कहाँ से आता है 
सताया कभी हाथ भी उठाया 
रोज़ नीचा दिखाया 
उसकी हरेक कमी को 
बड़ा कर के दिखाया  
किसी बात की तारीफ़ नहीं  
जब बोलने की कोशिश 
आँखें दिखा डराया 
माँ बहन की बात मान 
कोसा भी उसे अक्सर  
     पता नहीं भारतीय नारी में दम कहाँ से आता है 
छोटी छोटी बात पर चिल्लाता है 
खुद को महान उसे निकृष्ट बताता है 
हर व्यक्ति उसे धरती बन सहना सिखाता है 
फिर उसमे दुर्गा बनने का दम कहाँ से आता है 
कैसे कपडे पहने कैसे बोले कैसे चले 
सारा समाज उसे बताता है फिर भी----
     पता नहीं भारतीय नारी में दम कहाँ से आता है 
जहाँ देखो नारी की बेइज़्ज़ती शोषण नज़र आये 
वो चाहे दस लोगों को खिला के खाये 
पर उसका खाना घर भर को चुभ जाए 
एक औरत मर्द को भाये पर हाथ न आये 
शिकार छिन जाने सा फड़फड़ाये 
जहाँ महिलाएँ ही महिलाओं को, उनकी हद समझाएं 
पता नहीं भारतीय --------
       ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️ 

मीठी वाणी

अनुभव की अकड़ में, न तन प्राणी तू 
बोल मीठी मधुर, मृदु वाणी तू 
माना श्रम किया बहुत, सहा तूने बहुत 
पर इसकी दिखा न, मेहरबानी तू 
 बोल मीठी मधुर, मृदु वाणी तू -----

जीवन अनुभव से माना, मन कड़वा हुआ 
कंठ तक रख ज़हर, बोल मीठी वाणी तू 
आज के वक़्त में दर्द पसरा हुआ 
हर उपाय यहाँ बेअसरा हुआ 
अपनों से बात कर, यूँ न अनजानी तू 
बोल मीठी मधुर, मृदु वाणी तू---- 

तन है तेरा शिथिल, दे सकेगा भी क्या 
कम से कम न दे दूजी, आँखों में पानी तू 
जो जितना तेरा करे, शूल सा वो गड़े 
इतनी भी क्या अकड़, न कर बेईमानी तू 
बोल मीठी मधुर, मृदु वाणी तू -----
       ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️ 

मेहमान

आजकल अपने घर में मेहमान-सी लगती हूँ  
शायद कुछ ज्यादा ही परेशान-सी लगती हूँ 
आईने सच सच बता क्या अब भी वही हूँ मैं 
नित हो रहे बदलाव से हैरान-सी लगती हूँ  
       ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️ 

उसकी हालत न बदलेगी

जब तक नारी न बदलेगी उसकी हालत न बदलेगी 
जब तक नारी न बोलेगी उसकी हालत न बदलेगी
जब तक नारी अशिक्षित है उसकी हालत न बदलेगी
तर्कसंगत यदि सोच न होगी उसकी हालत न बदलेगी 
जब तक खुद पे विश्वास नहीं, उसकी हालत न बदलेगी
जब तक है दूजों पर निर्भर, उसकी हालत न बदलेगी
जब तक भावनाओं का जोर, उसकी हालत न बदलेगी
औरत औरत का साथ न दे तो उसकी हालत न बदलेगी
यदि देवी कहलाने का लालच, उसकी हालत न बदलेगी
चाहे जितना जोर लगा लो, उसकी हालत न बदलेगी 
जब तक इतिहास से सबक न लेगी, उसकी हालत न बदलेगी 
खुद को बदलना बहुत ज़रूरी वर्ना हालत न बदलेगी 
             ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️