हमारा किसान

दिन रात मेहनत कर रहा
 जो पेट सबका भर रहा 
 जो छल से सदा दूर है 
 वो आज क्यों मजबूर है ?
 झुलसी हुई जिसकी त्वचा 
 झुर्रियों से चेहरा भरा 
 माथे पे जिसके है शिकन 
 वो सबके दिल से दूर है?
 जिसने की सबकी मदद 
 जो इस देश की रीढ़ है 
 सड़को पे क्यों आया है वो 
 तू इतना क्यों मगरूर है?
 क्या सोचता है तू बता
 क्या बन गया है तू खुदा 
 कील और कांटे बिछाकर 
 मारा बड़ा तूने तीर है ?
 वक़्त है अभी भी जाग 
 सच्चाइयों से यूँ न भाग 
 दे दे उसको उसका हक़ 
 वो देश की तक़दीर है 

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