डर

आइये ये सोचे
  क्यों हर किसी से डरते हैं
 हमारे पास जो भी है
  उसके लुट जाने से डरते हैं
 अंत अहम् का 
 जो चाहा था हमने 
 और बड़ा हो कर
  वो सामने खड़ा है
 खुद से बड़ा ना हो जाए
 बस इस बात से डरते हैं
  हो गए समझदार 
 और गंभीर भी हम 
 दुनियादारी में मर जाए
  न मासूमियत हमारी 
 बस ऐसी तरक्की से डरते हैं 
 आरजू और जुस्तजू 
 ख्वाहिशों का समंदर है 
 दिल रेत का घरोंदा है
 कहीं टूट जाए न
  लहरों से डरते हैं
 आइना कहे अच्छे हैं 
 अपने कहे अच्छे हैं 
 अतीत बदल सकते नहीं
  भविष्य से डरते है 
 आइये ये सोचे क्यों  
  क्यों हर किसी से डरते हैं

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