मंजिल

क्यों मंजिल बन के तुम मेरी
  धुंधलके में खो जाते हो 
 सचमुच हो मंजिल मेरी या
  मन को यूँ ही भरमाते हो 
 क्यों होंठ नहीं तुम खोलते हो
  राजेदिल क्यों नहीं बोलते हो 
 क्यों खुशबू बन के तुम मेरी
  साँसों में घुल जाते हो 
 तुम हो मेरे अपने या
  अपनापन यूँ ही जताते हो 
 अनजाने ही अपने बन कर 
 क्यों मेरे ख्वाब सजाते हो
 हो भ्रम या सच्चाई हो
 तुम देते नहीं दिखाई हो
 श्वास श्वास में हो तुम या
 सिर्फ मेरी  'परछाई' हो

One thought on “मंजिल

  1. जब मैं seventh ya eight में पढ़ती थी tab se muzhe ye kavita yaad hai .इस कविता को surrender sharma ji ne bahut saraha tha.

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