बेचैन आत्मा

चैन नहीं बहारों में
 ना ही पतझड़ में
ना ही महफ़िल में
 ना  ही वीराने  में
चैन ना  ही काम में
 ना ही आराम में
ना ही चुप  रहने में 
ना ही कुछ कहने में
चैन ना ही दुनियादारी में
 ना ही पूजा ध्यान में 
ना ही अपनों में
 ना ही परायों में

ये बेचैनी आत्मा की है
 या मन की 
कोई तो सुलझा दो
 गुत्थी जीवन की 
सुख दुःख उतार चढाव
 ये क़शमक़श जीवन की
हे ईश्वर बता दो ना
 सच्चाई जनजीवन की
संतोषधन देकर मिटा दो 
मृगतृष्णा मन की 
अंतहीन यात्रा 
सुखद हो जीवन की 
तेरे सच्चे प्यार में
 भीगे ये जीवन  
मिट जाए आत्मव्यथा
 इस चंचल मन की 

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