क्या सच में ऐसी हूँ मैं

कोई मुझे कैसे पहचाने 
जब मैं ही ना
 पहचानूँ खुद को
रोज़ आइना देखूं पूछूं 
क्या सच में ऐसी हूँ मैं 
कोई रोये
 तो रोता है दिल 
कोई हँसे तो हंस दे
सब की ख़ुशी में खुश 
क्या सच में ऐसी हूँ मैं 
कोई कभी जो
 आँख दिखाए 
यूँ ही बेज़ा
 बात सुनाये
 हरदम मुझको
 नीचा दिखाए
जानबूझकर
 रहती हूँ चुप 
क्या सच में ऐसी हूँ मैं
कभी लगता है
 सबको हरा दूँ 
जो हैं सितमगर
 उनको सज़ा दूँ
 ले लूँ हर
 अपमान का बदला 
क्या सच में ऐसी हूँ मैं
कुछ अपनों के लिए
 कुछ अपनों का
 जिन्होंने दिया है
 प्यार हमेशा  
उनका अपमान
 कैसे सहूँ मैं 
कब तक सहूँ मैं
फिर भी 
सह ही रही हूँ चुप सी 
क्या सच में ऐसी हूँ मैं
पता नहीं अच्छी
 या बुरी हूँ
 पर जैसी हूँ 
वैसी हूँ क्यों मैं  
क्या सच में ऐसी हूँ मैं




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