चारों तरफ

कैसी ख़ामोशी है ये जो
 फैली है चारों तरफ 
मौत की क्यों बारहा 
आहट है चारों तरफ
अपनों की अपनों से
 बढ़ रही हैं दूरियां 
डर फैला रहा है बाहें 
हाय क्यों चारों तरफ
किस तरह खुद को बचाएँ 
गूँज है चारों तरफ 
हवाएं भी हो गयी
 ज़हरीली चारों तरफ
सिर्फ खोने पाने का
हिसाब है चारों तरफ 
कौन है जो बांटता है दर्द 
यूँ चारों तरफ
कुछ तो साज़िश है
 कि हर शय यूँ बिखर रही 
धर्म जातपात भ्रष्टाचार 
और बीमारियां 
बेरोज़गारी गरीबी
 और ढ़ेर सी  दुश्वारियां
है तो बस है 
भावनाओं का ज़्वार 
है चारों तरफ 

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