पार्क

आज मैं गयी पार्क  
बहुत दिनों बाद 
हो गयी हैरान 
पतझड़ से सब लगा
सूना  वीरान
ना घास थी हरी हरी 
 झड़ गए थे सब पत्ते 
कट गयी थी डालियाँ 
 ना फूल ना ही कलियाँ
 गर्म गर्म हवाएं
 खेल रहे थे बच्चे 
इस सब से बेपरवाह अनजान  
अपने खेलने में मशगूल 
वो तो थे आशान्वित 
आने वाली बहार से  
कुछ बुजुर्ग
 ताश खेल रहे थे 
बच्चों की तरह आपस में
लड़ भी रहे थे  
चिड़ियाँ चहचहा रही  थी 
पेड़ अडिग खड़े थे 
कुछ योग कर रहे थे  
कुछ चल रहे थे
कुछ भाग रहे थे  
उनको देख मन
 खिल गया
खुश रहने का राज
जो मिल गया 
 रहूंगी आशान्वित अडिग 
जीवंत और बेपरवाह 
चाहे कितनी भी मुश्किल 
हों जीवन की राह  

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