माँ

इतने ऊँचे पायदान पर मत बिठाओ उसे 
कि वो दिल की ना कह सके 
छोटी छोटी खुशियों की मांग ना रख सके 
खुल के ना हॅंस सके ना रो सके 
वो भी तो सामान्य औरत है 
महानता के खिलौने से मत बहलाओ उसे 
माँ सिर्फ प्यार ही क्यों करे 
गलती पर सज़ा का भी अधिकार हो उसे 
वो रच सकती है पर रचना पसंद ना आये तो 
उसकी कमियाँ सुधारने का भी अधिकार हो उसे 
हाँ वो गलत भी हो सकती है,एक नहीं कईं बार! 
माफ़ी उससे लेना ही नहीं ,देना भी सीखो उसे 
बिनशर्त प्यार मिला हमेशा तुम्हें 
तन मन धन लुटाया हमेशा उसने 
तुमको समझा अपनी दुनियाँ उसने 
अपनी दुनियाँ के अधिकार, मत समझाओ उसे 
हाँ ये दुनिया का रिवाज़ है 
ऐसा ही होता है 
वो समझ जायेगी धीरे धीरे 
बस तुम मत समझाओ उसे 
बस तुम मत समझाओ उसे 

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