ज़मीर ?





वो भी पूरे गिने नहीं 
जो गए शरीर से 
उनकी गिनती क्या होगी 
जो गिर गए ज़मीर से 

मेड

हाय कैसी विपदा आयी,
आज मेरी मेड नहीं आयी,
सिंक भरा है बर्तन से, 
देख आँख मेरी भर आयी ।  
झाड़ू पोंछा कौन करेगा, 
डस्टिंग घर की कौन करेगा,   
उसको तो आराम मगर,
हो गई  मेरी पिलाई।    
पौधों में पानी भी देना,
कपड़ों की तह भी करना,  
सब्ज़ी तक तो कटी नहीं,
खाने की बारी आयी। 
कोई नहीं मेरी मदद करे जो, 
दर्देदिल ये दूर करे जो ,
थोड़ा सा कोई काम करा दे, 
इतनी भी शर्म ना आयी।  
आज मुझे अहसास यही है, 
मेरे जीवन की ख़ास वही है ,
सुख दुःख में काम है आती, 
जो ना पति बच्चे करें ना भाई।

उत्तम योगी

"जो भक्तजन मुझमे मन को
एकाग्र कर निरंतर मेरे भजन ध्यान
में लगे अगाध श्रद्धा से मुझ  
सगुण परमेश्वर को भजते हैं
वो योगियों में उत्तम योगी हैं !"    

बेरहम

इस बेरहम दुनियां में  कैसे प्यार के नग्मे लिखूं 
कैसे खुशियों से भरे मोहब्बत के तराने लिखूं 
इतनी उम्मीद से मेरी तरफ ना देख ,ए दोस्त! 
मज़बूर हूँ कि आँसू दर्द आह चीखें और बिछोड़ा लिखूँ  

त्रिगुण

त्रिगुणी माया! त्रिगुणी काया! पल पल खेले खेल! 
कभी लगे ये दुनियां प्यारी ,कभी लगे बेमेल 
जब गुण गुणों में बरतते, छोड़ रागद्वेष का खेल 
माटी का तन मिले माटी में ,कर आत्म परमात्म का मेल

गलती या गुनाह

गुनाह अपने हों या दूसरों के 
सब रब की निगाह में हैं 
हमारा हर गिला शिकवा 
अब उसी के दरबार में है  
 लोग अपने गुनाहों को 
यहाँ गलती बताते हैं 
और हमारी गलतियां भी 
गुनाहों की कतार में हैं 
ये है गलती या है गुनाह 
सही फैसला कैसे करे कोई 
इन्साफ तो हमेशा ही 
ताकतवर के इख्तियार में है 

दुराचारी

यदि कोई अतिशय दुराचारी भी 
दुराचार छोड़ अनन्य भाव से 
भगवान को भजता है 
तो वो साधू ही है !
वो समझ चुका है
परमात्मा के समान 
कुछ भी नहीं है ! 
वो शीघ्र ही धर्मात्मा हो
परम शांति को प्राप्त होता है !
भगवतभक्त कभी नष्ट नहीं होता !

तलबगार





ए रब ! तूने कभी मेरा हाथ नहीं छोड़ा 
मैं तेरी रहमत की शुक्रगुजार हूँ    
सौंप दी दुनिया तेरी निग़हबानी में
तेरे रहम ओ कर्म की तलबगार हूँ 

ज़ुदा

ना कर किसी को ज़ुदा उनके अपनों से 
या फिर उनको भी उनसे ज़ुदा करदे 
नहीं सहन होता बिछोह का दर्द ए रब 
न हो यकीं तो कुछ पल खुद को इंसान कर दे