शायरों की ये हसीनाएं

उफ़ !शायरों की ये हसीनाएं 
कहीं कागज़ों से निकल 
सामने ना आ जाएँ 
ख़्वाबों में बसी ये दिलकश भावनाएं 
कहीं सामने ना आ जाएँ
हुई उनकी भी कुछ इच्छा ,सपने, चाहतें  
मांगने लगी अगर अपनी बातों का भी जवाब
रूठने लगी या चाहने लगी कुछ और 
जो शायद तुम्हारे ख्यालों की दुनिया में फिट ना बैठे 
पता लगे उसका है अपना वज़ूद, अपनी शख्सियत 
ओहो ! ये तो खुद भी इंसान है 
ये तो हंसती है ,रोती है ,ज़िद्द करती है
रूठती है मनाती है लड़ती है 
जो नहीं बनी सिर्फ आपकी दिलजोई के  लिए  
साहब सर्दी में पसीने ना आ जाएँ 
आँखों में आंसू ना आ जाएँ 
छोड़िये उन्हें ख़्वाबों और कागजों में ही रहने दो 
उन्हें वही छोड़ शायरों को कुछ भी लिखने कहने दो  



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