दौर

मोहब्बतों के दौर भी गुजर गए 
रंजिशों के दौर भी गुजर गए 
सन्नाटा पसरा है ऐसा ज़ेहन में 
आरज़ू  किसकी है पता नहीं
मोहब्बतों के दौर ....
ऐसा नहीं की कोई ख्वाहिश नहीं 
ऐसा नहीं की कोई ज़ुस्तज़ु नहीं 
आँखें धुंधली सी हैं, नहीं देता कुछ सुझाई 
मंज़िल कहाँ है पता नहीं 
मोहब्बतों के दौर .....
अब तो कोई दुश्मन भी नहीं रहा 
मगर दोस्त भी कोई नहीं है 
विश्वास ने छला है ऐसे 
करें विश्वास किसपर और क्यों! पता नहीं  
मोहब्बतों के दौर ....
खुद पर विश्वास है बाकी 
खुद से थोड़ी आस है बाकी 
वक़्त थोड़ा लगेगा,होगी साफ़ फिर नज़र 
ऐसा नहीं ज़माने में अच्छाई नहीं 
मोहब्बतों के दौर ......

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