नारी

हाँ मैं पहेली हूँ
 मानती हूँ !
उसे पता भी नहीं
 मैं उसके बारे में 
कितना जानती हूँ 
वो मुझे पढ़ने का 
दावा करता है 
मैं उसे शोध  का 
विषय मानती हूँ 
नारी हूँ !
ऋषि मुनि भी ना 
जान पाए मुझे ! 
मैं उसके हर  वार को
पहचानती हूँ !
सुन तन से ऊपर उठ 
मन की तह में पहुँच !   
तो ही पा सकेगा मुझे !
ये वो कर ही नहीं पायेगा
मैं जानती हूँ !
चारों तरफ शोर
सिर्फ सच्चे प्यार का 
इसी को बनाया सभी ने
मेरे लिए जाल 
मानती हूँ !
सुन समय की धारा में 
मेरे साथ बह ले   
इसी में है सच्चा सुख !
कोई सुलझा नहीं 
सकता मुझे जब
 मैं ठानती हूँ !

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