बेहतर की दौड़

इससे बेहतर कुछ और !
उससे बेहतर कुछ और !
चारों तरफ दिखी हमे 
सिर्फ यही दौड़ !
क्या होगा जब 
उसको मिल जाए ,
तुझसे बेहतर कोई और ?
कहीं तो रुकना भी होगा 
कहीं तो झुकना भी होगा 
समय निकल जाए तेरा  
और मिले ना कोई ठौर !
प्यार और समर्पण 
जो दूसरों को देते हैं 
वो खुद भी आतंरिक 
संतोष में रहते हैं 
सफर में ही निकल जाए ना 
पूरी ज़िन्दगी तेरी !
वापस वही पर आये 
कोई कितना भी भागे ये दौड़ !
क्या कभी किया आपने 
इस बात पे गौर ?
इससे बेहतर कुछ और !

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