चुनावों का मौसम

ए काव्य मन ! तेरी कलम ना हो राजनीति से प्रेरित  
है चुनावों का मौसम  !
तेरे ज्ञान की कुल्हाड़ी से तेरी शाख ही ना कट जाए 
है चुनावों का मौसम  ! 
तू तो है मानव संवेदनाओं भावनाओं से जुड़ा हुआ 
तेरा हर गीत प्रेम अपनेपन से था गुँथा हुआ 
भ्रमित भी हो सकता है तू! इस बात का विचार कर
संभल ! झूठ सच का कॉकटेल समाज में मिला हुआ  
यहाँ  है चुनावों का मौसम  !
सरकारें आयी गयी, स्थिति कमोबेश एक सी !
गरीब और गरीब ! अमीर और अमीर हो गया ! 
ना जाने प्यार भाईचारा विश्वास कहाँ खो गया ? 
कड़वा ना बोले था कभी जो! बातें करे ज़हर सी !
सुन ! है चुनावों का मौसम !
देख सड़कों पे है जो हममे से एक! तुझसा मुझसा ही तो है!
हर नुकसान कुर्बानी होती हमेशा उसी की  है 
तू तो बस जनता को सही राह दिखा ! गर हो सके! 
चयन करना अधिकार उसका ! समझ उसकी अपनी भी है   
ठीक है ना ! है चुनावों का मौसम !

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