रात

इसकी बात, उसकी बात, ना जाने किस किसकी बात  
करवटें बदलते गुजरी, हाय मेरी तमाम रात! 
उफ़ ये बेचैनी है कैसी !क्या बेकरारी का सबब ?
बेचैनी कम हो जाएंगी क्या ?गर छोड़ दूँ ख्वाहिशों का साथ !

मैं नहीं चाहती ,कैसी भी  !कोई शय चुराए नींदें मेरी ! 
मैं तो बस चाहूँ पुरसुकून प्यारी सी एक चांदनी रात 
जान के भी अनजान बन पाने की जो हैं ख्वाहिशें !   
वजह वही हैं जो ना सोने देंगी मुझको सारी रात 

कर सके तो कर ले यारा अब तो खुद पर भी यकीन 
वरना कर दे अलविदा तू अपनी नींद आज की रात  
इसकी बात उसकी बात ना जाने किस किसकी बात  
करवटें बदलते गुजरी हाय मेरी तमाम रात .......

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