हमसफ़र

क्या जाने मुझे कितने, दर्द में डुबो गया 
आज वो नाराज़ होकर पीठ करके सो गया... 
आंसुओं में भीगा, चेहरा था मेरा मगर !
मुँह धुला समझ कर वो, अपने में ही खो गया...
जिसको अपना समझ के ,बिता दी हमने एक उम्र   
किस्मत के इम्तिहान में वो, फिर से जीरो हो गया  ...  
मिट्टी उसकी और हमारी दोनों की करामाती है 
ना वो बदला ,ना ही हम ,आज साबित हो गया ...
हमको समझ ना आया वो, और ना उसको हम 
ना जाने कैसे ये लम्बा सफर ,यूँ ही तय हो गया ...

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