इन्साफ

खुदा भी क्या करे इस  
ज़माने की फितरत पे 
गुनाह बढ़ रहे हैं और 
इन्साफ की गुहारें भी !  
हमे भी लेनी होगी ज़िम्मेदारी 
अक्ल तो हमें भी है बख्शी 
कुछ फैसले हों अपने भी 
कुछ इन्साफ हों हमारे भी ! 

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