पत्ते

शाख से टूटे हुए पत्ते नहीं हैं हम 
हवा ले जाए इधर उधर कभी भी  
कुचले गए गमो उलझन में तो क्या ! 
बारम्बार  उठने का ज़ज़्बा है अभी भी  

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