कमतर

अंतर्मुखी बताते रहे उसे !
कहा कुछ नहीं हो तुम  
ना हुस्न है,ना सलीका
गयी गुजरी ,हो सबसे कम !
यहाँ गुणों की कदर किसको,
स्वाभिमान है नहीं सहन 
अब हुस्न भी है,सलीका भी,
बहिर्मुखी भी हो गयी है वो !
फिर भी कमतरी के अहसास 
किसी को बांटती नहीं है वो!
जो भी मिला किसी से 
वो हमेशा दिल में ही रखा 
बेइज़्ज़ती और दर्द 
कभी बांटती नहीं है वो !

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