वक़्त

पता चले ना चले , वक़्त गुजर जाता है 
शाम जब आती है , सूरज भी ढल जाता है 
ज़िन्दगी  की शाम से इतना ना घबरा 
वक़्त की क़द्र कर ,दिन ज़रूर आता है 

कोई समझे या ना समझे तुझे दोस्त 
गौर कर खुद को तू कितना ,समझ पाता है     
कोई अंधा सिर्फ आँखों से नहीं होता 
दिलोदिमाग का पर्दा बड़ा सताता है

लब मुस्काते  हैं उसके और आँखे सूनी  
होता है यूँ दर्द जब हद से गुजर जाता है  
क्यों समझते हैं हमे लोग कमज़ोर 
हमारे साथ भी, भीतर भी, विधाता है 

आप होंगे बहुत मशहूर ,अमीर ,काबिल माना  
हम खड़े हैं सामने तो कुछ तो हमे आता है 
पता चले ना चले , वक़्त गुजर जाता है 
शाम जब आती है , सूरज भी ढल जाता है 


10 thoughts on “वक़्त

  1. बहुत खूबसूरती से कह दिया आपने
    आप होंगे बहुत मशहूर ,अमीर ,काबिल माना हम खड़े हैं सामने तो कुछ तो हमे आता है
    अप्रितम, अनुपम , रचना😊

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  2. क्यों समझते हैं हमे लोग कमज़ोर
    हमारे साथ भी, भीतर भी, विधाता है

    bahut hi badiya

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