3 दोहा

अपना सब कुछ दे दिया ,मिली ह्रदय की पीर ।
धैर्य नहीं दे साथ तो, नैनन छलकत नीर ।
नैनन छलकत नीर ,कहे सीमा बेचारी ।
हृदय घाव की पीर, सदा होती है भारी।।
मन तड़पत ज्यूँ मीन,बिखर जाता तब सपना।
दुख का कारण बने,कभी जब कोई अपना।।
         ( कुण्डलिया छंद ) 

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