ज़ंजीरें

जो अपनी जगह से हिलते नहीं, बंधनों से वो अपने निकलते नहीं  
कैसे जानें वो अपनी मज़बूरियाँ,  वो जब किसी से भी मिलते नहीं  
न आँकी कभी जो मज़बूतियाँ, कैसे तोड़ेंगे अपनी ज़ंजीरें वो,   
ऐतराज़ वक़्त रहते जो न करें,अपनी हिम्मत जो आज़माते नहीं     
                   ✍️सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️

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