आकर्षण

आकर्षण चारों तरफ, तन में रहे न ज़ोर   
याद रहे  बीवी तभी, आवाज़ें नित भोर 
आवाज़ें नित भोर,  अदा सब ह्रदय लुभावें  
आदत होती घोर, कभी न अलग रह पावें   
व्यंग्य-बाण की आग, कभी जो होता घर्षण 
झूठ-मूठ की रूठ, नहीं कम हो आकर्षण
               ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️

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