शुभकामनाएं

महकें चहकें चमकें झूमें ,जीवन की हर दिवाली आप 
दसों दिशाओं चारोँ ओर से,बरसे खुशियों की सौगात ! 
मुस्काएं नैन दीप ,हो हंसी खिलखिलाहट चारोँ ओर  
इस जीवन में कभी न सूखे प्रेम और शांति की बरसात !
सबका हर दिन शुभ  मंगलकारी हो  मन में आनंद  
विनती यही प्रभु कृपा बरसे,हम पर यूँ ही दिनरात ! 
धन तेरस,छोटी दिवाली,बड़ी दिवाली ,गोवेर्धन पूजा 
और भैया दूज की,आप सभी को सपरिवार शुभ कामनाएं !

माँ दुर्गा

" आप सब जानते हैं माँ दुर्गा के बारे में
सच कहूं तो कुछ भी नया नहीं बता पाऊँगी 
पर आप सभी में स्थित माँ दुर्गा के अंश को मेरा नमन ! 
आज माँ को बस दिल से पुकारूँगी  "

हे दुर्गा माँ !नमन आपको !
दुर्गातिरशमनी कर दुःख शमन !  
शिव की शक्ति,बुद्धि रूपी,लक्ष्मी रूपी
माँ तुझे नमन !       
भक्तिरूपी शक्तिरुपी शांतिरूपी 
माँ तुझे नमन !
अपने आँचल की छाँव दे हमको  
प्यार कृपा से भर दे दामन !
हम सब तेरे चंचल बालक 
स्नेहपूर्ण तेरा अंतर्मन !
श्रद्धारूपी लक्ष्मीरूपी स्मृतिरुपी            
माँ तुझे नमन !
अंतर्यामी माँ मेरी तू 
जाने सबका अंदर बाहर !
माँ के प्यार बिना तरसे है 
चाहे जितना बड़ा हो बालक !  
तुष्टिरूपी दयारूपी मातृरूपी 
माँ तुझे नमन !   
जीवन के हर घर्षण में 
तुमको मेरा सब कुछ अर्पण !  
आत्म मुग्ध ना बनूँ कभी
देखूं हमेशा मैं मन दर्पण !
सर्वसुखदायिनी पापनिवारिणी 
हे दुर्गा माँ ! कोटि नमन ! 
कोटि कोटि नमन !

क्या हो तुम

रब /राम / परमात्मा /गॉड / कृष्ण ! क्या हो तुम !
तपती हुई रेत पर पानी की बूँद तुम 
जीवन की गर्म हवाओं में शीत पवन तुम 
हम सभी प्राणियों का भार सहती धरती तुम 
सभी के संरक्षक सर की छत आकाश तुम  
दिन भर के थकेहारे को सुकून भरी रात तुम 
घोर अंधियारे को चीरते हुए चाँद सितारे तुम 
अँधेरे को काटते उम्मीद की किरण लिए भोर का सूरज तुम 
लहलहाते खेत तुम बागों की बहार तुम 
मज़दूर का पसीना तुम ! किसानो की मेहनत तुम 
सैनिकों की वीरता तुम ! इंसानों की बुद्धि तुम 
माँ बाप गुरु तुम ! हर प्यार करनेवाला हाथ तुम 
हर मज़बूत बनानेवाला वार तुम ! वार भी, शत्रु भी तुम ! 
जीते जीते थक गए तो मौत की मीठी नींद तुम 
हो तुम कहाँ नहीं ! हर स्वास हर धड़कन में तुम 
अदृश्य भी दृश्य भी ! हो शाश्वत हर सत्य भी !
क्यों तुम्हें पुकारूँ मैं !वाणी की हो जब शक्ति तुम !
कुछ ऐसा करो परमपिता ! हो मुझ पर तेरी कृपा ! 
मैं कहीं भी ना रहूं ,रहो तो सिर्फ तुम ही तुम !

सब कुछ

सहज सरल जीवन मिले जिसको 
प्रभुकृपा समझो मिली उसको 
सुख शांति प्रेम  मुस्कान होठों पे
प्रभु प्रसाद समझो मिला उसको 
मगर प्रभु प्रीत ,आभार ह्रदय में हो 
तो समझो सब कुछ मिला उसको 

गीता ज्ञान

 संजय ने गीता में कहा -

जहाँ हैं योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण
जहाँ हैं गांडीव धनुषधारी अर्जुन  
वहां ही है श्री ,विजय ,विभूति
और अचल नीति !
ये मेरा मत है 
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !

परमात्म शरण

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । 
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

"सभी धर्मों को यानि सभी कर्तव्यकर्मों को
त्यागकर तू केवल मेरी शरण में आ
मैं यानि सर्वशक्तिमान सर्वाधार परमेश्वर
तुझे सभी पापों से मुक्त कर दूंगा शोक ना कर"

परमात्मसिद्धि

"जिस परमेश्वर से उत्पन्न हुए सभी प्राणी
जिससे व्याप्त है ये सारा जगत
उस परमेश्वर को पूज अपने स्वाभाविक कर्मों से
यही पूजा करे 'परमात्मसिद्धि 'प्रदत्त "
'सही आचरण से निभाए दूसरे के धर्म से
अपना गुणरहित धर्म भी श्रेष्ठ है
क्योंकि स्वभाव से निश्चित स्वधर्म रूपी कर्म से
मनुष्य पाप का भागी नहीं होता'

तीन तरह का सुख

जिस सुख में मनुष्य भजन ध्यान
और सेवादि के अभ्यास से आनंदित होता है
और दुखों का अंत होता है
जो शुरु में लगे विष सामान पर अंत में अमृत समान
परमात्मा से जुड़ी बुद्धि से मिला
वो सुख सात्विक है  
विषय और इन्द्रियों के संयोग से
हो जो सुख उत्पन्न
भोगने में हो जो अमृत जैसा  मगर
परिणाम में विष जैसा
वो सुख राजस है
जो करे सुख भोगने में और
परिणाम में मोहित आत्मा को
जो निद्रा आलस्य और प्रमाद
से हो उत्पन्न
वो सुख तामस  है
पृथ्वी ,आकाश ,देवता
या कही भी ऐसा कोई नहीं
जो रहित हो  इन तीन गुणों से

 सात्विक त्याग 

"जो ना करे अकुशल कर्म से द्वेष
जो ना हो कुशल कर्म में आसक्त
वो है सत्वगुणी संशय रहित
बुद्धिमान और सच्चा त्यागी "
किसी भी मनुष्य का पूरी  तरह से
सब कर्मों का त्याग नहीं संभव
इसलिए जो कर्मफल  का करे त्याग! वही त्यागी
कर्मफल का त्याग ना करने पर
अच्छा फल या बुरा फल या
थोड़ा अच्छा थोड़ा बुरा
कोई ना कोई फल ज़रूर मिलता है
कर्मफल का त्याग करने पर
किसी भी काल में कर्मों का फल नहीं है