न्याय

अपनी महत्वकांक्षाओं स्वार्थ और अहम्
की लगाम अपने हाथ में रखें ,छोटा हो या बड़ा !
वर्ना आप खो देंगे सब कुछ धीरे धीरे 
ब्रह्माण्ड प्रकृति और वक़्त का न्याय है कड़ा !!

नरक के द्वार

"तीन हैं नरक के द्वार
काम क्रोध और लोभ
जो करते हैं आत्मा का नाश!
इसलिए त्यागने योग्य हैं
जो मनुष्य है इनसे मुक्त वो अपने
कल्याण का आचरण कर
परमगति को प्राप्त होता है
मनमाना आचरण ना दे सिद्धि
ना सुख ,ना परमगति "
"कर्तव्य और अकर्तव्य की
व्यवस्था के लिए ही शास्त्र हैं
शास्त्रविधि से निर्धारित
कर्म ही करने योग्य हैं "

ऊर्जा स्त्रोत 1

भीड़ में अकेला बच्चा  परेशां सा खड़ा 
हार रहा है साथी बच्चों से 
अचानक माँ पर नज़र पड़ी 
चेहरा ख़ुशी से खिल गया 
जैसे ताकत का खज़ाना मिल गया
विश्वास से चेहरा दमकने लगा  
क्यूंकि वो अपने ऊर्जा स्त्रोत से मिल गया 
और हारने का डर दिल से निकल गया 
ठीक वैसे ही तू भी गर ब्रह्माण्ड 
अपने ऊर्जा स्त्रोत से मिल  गया
ज़िन्दगी चमत्कारों से भर जायेगी 
आत्मविश्वास ,असीमित संभावनाएं 
फूलों सा महकता जीवन जो होगा 
डर विहीन ,दर्दविहीन 
सम्मानित अपनी और दूसरों की नज़र में 

दिल की बात

जिसने दिल की बात ना मानी 
उसे मानो चाहे ग्यानी ध्यानी 
ज़रूर वो एक दिन पछतायेगा
दिल ईश्वर की ही प्रतिध्वनि 
     जिसने दिल की बात ना मानी ...
गुरु तुम्हारा दिल ही तो है 
जिसकी आवाज़ विवेक कहाती 
कोई सहारा हो या ना हो 
दिल की आवाज़ ही राह दिखाती
       जिसने दिल की बात ना मानी ...
अशांत  ह्रदय से मंद हो जानी 
शांत ह्रदय से स्पष्ट है आनी 
जब जब हो ये मन उद्विग्न 
तब तब ध्यान की ज्योत जगानी 
            जिसने दिल की बात ना मानी ... 





                          

सम हो जाने के बाद

हर दर्द हो जाता है बेअसर 
मन मज़बूत कर लेने के बाद 
पाने खोने का दर्द नहीं रहता 
सम हो जाने के बाद 

चारों तरफ होगी मीठी सी खुशबू 
दिल का कमल खिलने के बाद 
मेरा अहसास रहेगा हर रूह में ऐसे 
जैसे खुशबु रह जाए गुलाब छू लेने के बाद 

तू,तेरी दुनिया बदल जायें भी तो क्या 
क्या फायदा मेरे जहाँ से जाने के बाद 
मैं रहूँ या ना रहूँ सीख रह जायें मेरी 
याद चाहे ना रहे मेरे चले जाने के बाद
 

कलयुग का प्रेम

कलयुग के इस प्रेमरूप को है मेरा प्रणाम  !
जल्दी जीवन से मोह हटे, आये प्रभु का ध्यान 
जब भी ईश्वर को छोड़ ,ह्रदय लगे तनधारी
अश्रु पीड़ा घाव  छल ,होये यही परिणाम ...

आत्मा

      आत्मा को 
ना काट सके शस्त्र कोई
ना जला सके अग्नि कोई 
 ना भिगो सके जल कोई 
ना सूखा सके वायु कोई  
       आत्मा तो 
  अखंड सर्वव्यापी अचल 
अव्यक्त अचिन्त्य निर्विकार
  जो ज्ञानी जानता है वो
कभी भी शोक नहीं करता 

ज़िन्दगी के साज़ पर

ज़िन्दगी के साज़ पर ,बन तू धड़कनों की धुन 
छा मेरे वज़ूद पर !जैसे धरा पे ये गगन  
मस्त हवाओं सा मेरे, जीवन में लहलहाए जा 
झूम झूम गाये जा ,कह रही दिल की लगन 
                                  ज़िन्दगी के साज़ पर .........
दिल की हर आवाज़ पर ,मेरी हर एक याद पर 
ऱम जा सांसों में मेरी ,आ जाए रूह को सुकून  
बारिश की बूँदें ज्यों गिरे ,सेहरा की तपती रेत पर 
वैसे ही चैन आये दिल में, सो सकूँ मैं पुरसुकून
                                  ज़िन्दगी के साज़ पर.........
धीमे धीमे सुलग रही ,दिल में प्रेम की अगन 
पथ निहारते हैं देखो ,अश्रुपूरित नयन 
काश ऐसा हो !ना प्यास हो ,ना हो ये इंतज़ार
हर तरफ चमन में हो, दूर दूर तक सुमन सुमन 
                             ज़िन्दगी के साज़ पर..........
सब कुछ है मेरे पास तो, क्यों है ये दिल की चुभन 
हार ना मानूंगी मैं !करती रहूंगी हर जतन 
जो है तू मेरे पास ही ,मेरे साथ ही हर स्वास में 
तो क्यों ना आया अब तलक ,रूह को चैनो-अमन  
                              ज़िन्दगी के साज़ पर .........

भगवान का अस्तित्व

श्री कृष्ण ने गीता में कहा :
मुझ  निराकार परमात्मा से सारा  जगत
जल से बर्फ के समान परिपूर्ण है
सब मनुष्य मेरे अंतर्गत  
संकल्प शक्ति से हैं
पर वास्तव में मैं उनमे स्थित नहीं
किन्तु ये मेरी ईश्वरीय शक्ति है कि
प्राणियों को उत्त्पन्न करने वाला
भरणपोषण करने वाला होने पर भी
मेरी आत्मा प्राणियों में स्थित नहीं है
जैसे आकाश से उत्पन्न वायु
आकाश में ही है
वैसे ही मेरे संकल्प से उत्पन्न
सभी प्राणी मुझ में ही है

ॐ तत सत

ॐ तत सत-ऐसे तीन प्रकार का
सच्चिदानन्दधन ब्रह्म का नाम है    
जिससे सृष्टि के आदिकाल में
ब्राह्मण, वेद,और यज्ञादि रचे गए
इसलिए
"वेद मन्त्रों का उच्चारण करने वाले
श्रेष्ठ मनुष्यों द्वारा शास्त्रविधि से तय
यज्ञ, दान और तपरूपी कार्य
सदा ॐ  नाम का उच्चारण
करके ही आरम्भ होते हैं"
"तत नाम से कहे जाने वाले
परमात्मा का ही यह सब है  
इस भाव से फल को ना चाहकर
विभिन्न यज्ञ ,तपरूपी क्रियाएं
और दानरूपी क्रियाएं कल्याण
की इच्छावाले मनुष्य करते हैं "
सत नाम से कहे जाने वाले  
परमात्मा का नाम सत्य भाव में
और श्रेष्ठ भाव में प्रयोग होता है