182.दोहा

*जाति धर्म का क्यों तुझे,  है इतना अभिमान* 
*मन चाहा मिलता नहीं, प्रभु-प्रदत्त तू जान* 
    ✍️ सीमा कौशिक'मुक्त'✍️

जाति धर्म

चाहा मन का कब मिले, प्रभु-प्रदत्त तू जान
जाति धर्म का फिर तुझे, क्यों इतना अभिमान
क्यों इतना अभिमान,सबसे प्यार तू करले
जीवन प्रभु की देन, कभी विचार भी कर ले 
मानवता ही धर्म, रहे सबसे अनचाहा   
रख सद्भाव सुकर्म, सदा बस प्रभु का चाहा

भेड़चाल

देखा देखी करें बहुत, जगत में भेड़चाल 

गलत सही का फर्क रख, निज विवेक संभाल

निज विवेक संभाल, रीति-रिवाज़ में मत पड़

छोड़ अंधविश्वास , तू डोर ज्ञान की पकड़ 

चाहो स्वस्थ समाज, न ज्ञान तर्क अनदेखी  

चुकता उच्च हिसाब, किसी की देखा देखी

178.दोहा

*आत्म नियंत्रण रख ज़रा , इसमें सुख है मान* 
*लालच के इस खेल में , सब हारे तू जान*   
                 ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️