पर्यावरण

ये धरा पुकारती, मैं तेरी माँ भारती 
लाडलों तुम्हारी माँ, है तुम्हें पुकारती 
मत करो मेरा संहार, कर भी दो मेरा उद्धार 
मैं तो हमेशा से ही, रही तुम्हें सँवारती 

नदियाँ नहरें कूप, ताल सूखने लगे 
पर्वत पहाड़ भी, छँटने  टूटने लगे 
झील झरने सूख गए,सागर भी दूषित हुए 
जहरीली हवाएँ हैं, क्यों आत्मघाती बन रहे 
                     ये धरा पुकारती---------
तुम्हारी लालच हवस, देख-देख थक गयी 
अब तो मेरे लाल तू, कर भी दे न बस भई ! 
प्रकृति का विनाश रोक,जड़ से प्रदूषण मिटा 
दिल से कर वन-संरक्षण,, नित नए पेड़ लगा
      फिर देख कैसे मैं तुम्हें दुलारती  -----
      ये धरा पुकारती --------
                  ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️

हसरतें

दिल की हसरतें पूरी हों भी जाएँ, तो क्या 
कुछ पल को अगर सुकून मिल भी जाए, तो क्या 
यकीनन दिल में फिर जन्म लेगी नयी हसरत,
फिर तड़पेंगे हसरत मुकम्मल भी हो, तो क्या

ज़िन्दगी के सफर में, हसरतों के मेले हैं  
आज ये रही कल वो, न भी पूरी हों, तो क्या  
इस मेले से निकल, पाले सुकून का जीवन 
सुकून के बिन हसरतें पूरी भी हों, तो क्या 
         ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️      

ज़रूरत

यूँ तो किसी को किसी की भी सदा ज़रूरत नहीं होती 
पर ये सुनना बड़ा मुश्किल ! अब मेरी ज़रूरत न रही।
 
कुछ नहीं रहता बाकी कहने सुनने को,सब सकल ख़त्म 
जब बोल दिया अपनो ने ! अब मेरी ज़रूरत न रही।
 
ज़रूरत कहीं अन्यत्र पूरी हो गयी या ज़रूरत ख़त्म 
ज़रूरत बदल गयीं क्या ? कि अब मेरी ज़रूरत न रही। 

मत आने दो जीवन में वो वक़्त कि तुमसे कोई कहे 
जहाँ जाओ जो करो, अब तुम्हारी ज़रूरत न रही। 

आयी बहारें

चारों तरफ मंद मंद सी पवन 
झूमने लगा है ये मदमस्त मन
 
घुमड़ घुमड़ बादल छा रहे गगन 
बूंदें बरस रहीं, ज्यूँ आया सावन
 
प्यास धरती की, देखो बुझा रहा 
सौंधी महक से महका, घर आँगन 

पात पात धुल गया, उगे नए पत्ते
छायी हरियाली, चमके वन उपवन

हवाओं में फैली गजब की खुशबू
आयी बहारें!आ जाओ,अब तो साजन! 
                  ✍️सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️

पहली बारिश

धुली धुली सी है धरा, धुला धुला सा है गगन   
तप्त हवाएँ सर्द हुईं ....खिल उठा ह्रदय सुमन 
है पात पात धुल गया, महक उठा सारा चमन  
आसमाँ को एकटक.........निहारते मेरे नयन
         ✍️सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️

मेरा बेटा





मेरा बेटा मेरा दिल मेरा अहसास
मेरे दिल की धड़कन, है मेरी श्वास  
वो हर बार हर परिस्थिति में 
अलग ही किरदार निभाता है 
कभी माँ कभी बाप कभी भाई 
कभी दोस्त और बेटा तो वो है ही 
वो माँ बन जाता है जब प्यार से सर सहलाता है 
वो बाप बन जाता है जब गलती पर समझाता है
वो भाई बन सारे अहसास साझा करता है 
वो मेरा सबसे अच्छा दोस्त है जो मुझे 
सिर्फ समझता नहीं मार्ग दर्शन भी करता है  
समझ नहीं पाऊँ मैं वो कैसे 
दूर तक सोच और देख पाता है 
हर गम ज़माने का भूल जाती हूँ 
जब उसे गले लगाती हूँ  
वो तो मेरा प्यारा बेटा है
पता नहीं मैं उतनी अच्छी माँ हूँ या नहीं 
भगवान का सुन्दर उपहार, उसका प्यार!  
अपने प्रति प्यार देख उसी के लिए  डरती हूँ 
या रब !उसके जीवन को खुशियों से भर दे !
लबों पे मुस्कान दे ! दुनिया में नाम दे  !
उसे कभी कोई कमी न हो !
सदा सदबुद्धि रहे और रहे तेरा आर्शीवाद भी !
उसके लिए मेरी दुआएँ कबूल हों !आमीन !
                 ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️      

मयस्सर

वो लम्हें नहीं मयस्सर,जिन्हें सीने से लगा लूँ 
आ पास आ ज़िन्दगी, आ गले तुझे लगा लूँ 

कब रात आयी कब दिन, कब हुई सुबह-ओ-शाम 
कैसे गुज़रा वक़्त है ये, इसे कैसे मैं बचा लूँ  

इस दिल ने चाहा जो भी, वो मिला नहीं कभी भी 
दिल रोये और चीखे, इसे कैसे मैं मना लूँ 

मेरे दर्द की दवा भी, किसी सूरत हो न पायी   
ये वक़्त बने मरहम, थोड़ा मैं भी मुस्कुरा लूँ 

आसान है दर्द में, सुन 'मुक्त' यूँ कराहना 
हिम्मत से मुस्कुरा कर, दोनों जहाँ बना लूँ   
                           ✍️सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️

देशभक्त

देशभक्तों की आँखों में, अंगार शोभा नहीं देता 
होंठों पर नफरत का ज़हर, शोभा नहीं देता 

आप धार्मिक हैं तो, धर्म भी समझा करिये 
धर्म के नाम पर, दंगा शोभा नहीं देता 

कौन हैं वो लोग जो, नफरत की करें पैरवी 
ऐसे लोगों का साथ, हमें शोभा नहीं देता 

इंसानियत का धर्म, सब धर्मों से है ऊपर 
इसकी अवमानना का रवैया, शोभा नहीं देता 

दूसरों के दिल पर, दर्द की दस्तक मत दो 
वर्ना ख़ुद दर्द में कराहना, भी शोभा नहीं देता 

सदियों से गुरुओं पैगम्बरों ने, दिया जो सन्देश 
उसे बहकावे में भुलाना, हमें शोभा नहीं देता  

माँ से बातें

कितना मुश्किल है बड़ी उम्र में माँ से बातें करना
कहीं दिल की मायूसी का उन्हें आभास न हो 

कईं ख़्वाब जो टूटे समाज में इज़्ज़त रखते 
आवाज़ की भर्राहट में ये उन्हें अहसास न हो 

माँ को देखते ही माँ से बस लिपट जाना
नमी आँखों की छुपाने का विफल कहीं प्रयास न हो

कहने को तो कह सकते हैं माँ से दिल की 
पर उनकी उम्र बीमारी और प्यार, 
कहीं माँ के दिल टूटने का त्रास न हो
 
कितना मुश्किल है बड़ी उम्र में  
माँ से बातें करना     

ठीक हूँ माँ





मेरे टूटे हुए दिल और 
ख़्वाबों की किरचें 
माँ को न चुभ जाएँ कहीं 
वो मुस्कुराते हुए बोली 
ठीक हूँ माँ ...
एक उम्र गुजारी माँ बाप की 
इज़्ज़त रखने में 
सब्र का बाँध टूट न जाए कहीं 
पूरी जान लगा कर बोली 
ठीक हूँ माँ ...
बहुत बार दिल किया 
गले लग के कह दूँ 
वो सारी बातें जो 
जमती रहीं दिल में 
पर माँ को कुछ हो जाने का डर 
उसने तसल्ली दी ,बोली 
ठीक हूँ माँ ...
पर कभी कभी लगा 
बस बहुत हुआ 
आज नहीं कह पाऊँगी
जो हमेशा कहा 
ठीक हूँ माँ ...
मेरे लब ही न  खुले
और माँ बिनकहे 
सब समझती और 
समझाती रही 
और चला अनवरत ये कहना 
ठीक हूँ माँ ...