ख़ाली

*ख़ाली अंदर से रहे, जैसे हो फुटबॉल* 
*पड़े लात सबकी उसे, घर ऑफ़िस या मॉल* 
*घर ऑफिस या मॉल, उड़े जी मानो खिल्ली * 
*मिलता न आसमान , सदा दूर रहे दिल्ली *  
*बिन ज्ञान संस्कार, रहे सब उसका जाली*   
*चाहे हो धनवान, गगरिया दिल की ख़ाली*
          ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️  

सीख

सीख मिले कमज़ोर को, नहीं मिले बलवान 
रख न सके ख़ुद बात वो, हर पल दबता जान 
हर पल दबता जान, नहीं लत क्रोध जताना 
ज्यादा बिगड़े बात, पड़े है तब चिल्लाना  
शासक कैसे योग्य , नहीं जो बिन चीख हिले   
न कमज़ोर को साथ , खोखली बस सीख मिले     
          ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️  

आकर्षण

आकर्षण चारों तरफ, तन में रहे न ज़ोर   
याद रहे  बीवी तभी, आवाज़ें नित भोर 
आवाज़ें नित भोर,  अदा सब ह्रदय लुभावें  
आदत होती घोर, कभी न अलग रह पावें   
व्यंग्य-बाण की आग, कभी जो होता घर्षण 
झूठ-मूठ की रूठ, नहीं कम हो आकर्षण
               ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️

इज़हार

कैसा है ये प्यार जो, कर सके न इज़हार
ये शूरवीर ही करे, जो दिल से गुलज़ार
जो दिल से गुलज़ार, प्यार है  जिसका सच्चा 
प्यार सिर्फ है चाह, रहे बूढ़ा या बच्चा 
अपनाओ यदि प्यार, यार चाहे हो जैसा 
करे न जो इज़हार, प्यार है उसका कैसा

प्यारा

प्यारा तो बस प्यार है, है मनभावन गीत 
मधुर सुरीला गा इसे, सबका मन ले जीत
सबका मन ले जीत, प्यार है मधुर कहानी 
बोल न कड़वे बोल, सदा रख मीठी वानी
अपना हो हर शख़्स, लगे सबसे तू न्यारा  
बिन रिपु होते  प्राण, लगे है सबको प्यारा

फुलवारी

फुलवारी ये प्रेम की, जिसे कहे परिवार
प्यार आदर यकीन से, रहे सुदृढ़ आधार
रहे सुदृढ़ आधार, प्यार ही देना पाना 
आदर-औ-विश्वास, बिना इनके पछताना  
इन का डालो बीज, रहे रिश्तों में यारी  
सुखी रहे परिवार, सदा महके फुलवारी

दूरी

दूरी से भी हम रखें, इक दूजे का ध्यान
दुआ ह्रदय से हम करें, रखें प्यार का मान
रखें प्यार का मान, दर्द आओ जी बाँटें    
रब से जोड़ें हाथ, शूल दामन से छाँटें 
मदद अगर अरमान, पास होना न ज़रूरी 
रोज़ दुआएँ भेज, प्यार में कैसी दूरी

स्वार्थ

निज हित से ऊपर तकेँ ,ऐसे कम हैं लोग 
जो ऐसी कोशिश करें ,कहें लगा है रोग  
कहें लगा है रोग,रखो मतलब से मतलब 
काम नहीं है और, मौन बैठो सिलके लब 
रखो ह्रदय तुम साफ, करो मत उनको ख़ारिज  
जगहित की परवाह ,न सोचें वो स्वार्थ निज

पूर्ण

*अपनाओ तन-मन ह्रदय, पूर्ण प्रेम से पाग* 
*रिश्तों को नव मायने, रोज़ बढे अनुराग*
*रोज़ बढे अनुराग,प्रेम से कटे ज़िन्दगी*  
*करें अपूर्ण  प्रेम, लगे है एक दिल्लगी* 
*समझो जीवन सार, न अपना मन भरमाओ*   
*जीवन दो  उपहार , पूर्ण प्रिय को अपनाओ*

माँ

माँ से दूर जहान में, ख़ुशियाँ चाहे लाख 
आज़ादी भी है मगर, माँ के बिन सब राख 
माँ के बिन सब राख, रहे आनंद अधूरा 
उस के बिन हो भान, अधूरा सपना पूरा 
माँ चन्दन का पेड़, प्रेम होय दिलोजाँ से  
ज़िंदा हो तो जान, नहीं तो खुशबू माँ से