शाम

बादलों की गड़गड़ाहट 
चिड़ियों का चहचहाना 
बहें हवाएँ मद्धम-मद्धम
यूँ आँखों से मुस्कुराना 
है दिल में हड़बड़ाहट 
चाहे दिल गीत कोई गाना 
हुआ दिल से दिल का संगम 
ये शाम मधुर तराना 
आ हाथ थाम मेरा 
चल दूर चले कहीं हम तुम 
सुरमयी शाम,मदमस्त हम-तुम 
और हंसना हँसाना 

प्यार और दर्द

जो ज़रूरत से करे प्यार ..........वो प्यार ही ,होता है कहाँ
दर्द बर्दाश्त से बाहर हो............ तो वाज़िब, होता है कहाँ
इस दुनिया में मिल कर भी,किसी को,नहीं मिलता कुछ भी 
पर प्यार और दर्द के बिन ........जीवन यहाँ, होता है कहाँ

झुनझुना

मज़बूरी का झुनझुना मत स्वयं को पकड़ा
स्वतंत्रता से हमेशा …..अपनी राह चमका
दूजे पर निर्भर रहें…… ख़ुद का है अपमान
स्वावलंबन-संजीवनी…. से जीवन दमका

✍️सीमा कौशिक ‘मुक्त’ ✍️

तेवर

अकेला था कभी पहले, न अब हूँ मैं सुनो यारों
सदा वो साथ रहता था, अभी भी साथ रहता है
कभी रूठन कभी उलझन ,कभी माँगें खूब रखीं
यार मेरा मगर ‘तेवर’ मेरे, चुपचाप सहता है
सदा वो साथ रहता था, अभी भी साथ रहता है

✍️सीमा कौशिक ‘मुक्त’ ✍️

ज़ंजीरें

जो अपनी जगह से हिलते नहीं, बंधनों से वो अपने निकलते नहीं  
कैसे जानें वो अपनी मज़बूरियाँ,  वो जब किसी से भी मिलते नहीं  
न आँकी कभी जो मज़बूतियाँ, कैसे तोड़ेंगे अपनी ज़ंजीरें वो,   
ऐतराज़ वक़्त रहते जो न करें,अपनी हिम्मत जो आज़माते नहीं     
                   ✍️सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️

अहंकार

ये उन माँओं के लिए जो सास बनकर माँ नहीं रह पाती :-

वो माँ होने के अहंकार में बच्चे की ही ख़ुशी भूल गयी 
अपने अहम में चूर अपने बच्चों की ख़ुशी को ही लील गयी 
उसे किसी कारण, बेटे की मर्ज़ी वाली बहु पसंद नहीं थी  
तो वो माँ अपनी इंसानियत व अपना ज़माना भी भूल गयी

शोर

ज़रूरी नहीं कोई मारे किसी को और सज़ा पाए 
कभी कभी मर-मर के जीने को भी मज़बूर करता है  
ऐसे जगत में हैं हम साहब, इंसान गलत होता खुद 
मगर  दूसरे की गलतियों पर भरपूर शोर करता है

हुनर

धोखा देने का उसका हुनर लाजवाब है
हमें रसगुल्ले में मिर्च भर भर खिलाता है
पता चलने ही नहीं देता अंत तक कुछ भी
रोज़ कुछ नए रंगीन सब्ज़बाग दिखाता है
धोखा देने का उसका हुनर लाजवाब है

मयस्सर

वो लम्हें नहीं मयस्सर,जिन्हें सीने से लगा लूँ 
आ पास आ ज़िन्दगी, आ गले तुझे लगा लूँ 

कब रात आयी कब दिन, कब हुई सुबह-ओ-शाम 
कैसे गुज़रा वक़्त है ये, इसे कैसे मैं बचा लूँ  

इस दिल ने चाहा जो भी, वो मिला नहीं कभी भी 
दिल रोये और चीखे, इसे कैसे मैं मना लूँ 

मेरे दर्द की दवा भी, किसी सूरत हो न पायी   
ये वक़्त बने मरहम, थोड़ा मैं भी मुस्कुरा लूँ 

आसान है दर्द में, सुन 'मुक्त' यूँ कराहना 
हिम्मत से मुस्कुरा कर, दोनों जहाँ बना लूँ   
                           ✍️सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️

देशभक्त

देशभक्तों की आँखों में, अंगार शोभा नहीं देता 
होंठों पर नफरत का ज़हर, शोभा नहीं देता 

आप धार्मिक हैं तो, धर्म भी समझा करिये 
धर्म के नाम पर, दंगा शोभा नहीं देता 

कौन हैं वो लोग जो, नफरत की करें पैरवी 
ऐसे लोगों का साथ, हमें शोभा नहीं देता 

इंसानियत का धर्म, सब धर्मों से है ऊपर 
इसकी अवमानना का रवैया, शोभा नहीं देता 

दूसरों के दिल पर, दर्द की दस्तक मत दो 
वर्ना ख़ुद दर्द में कराहना, भी शोभा नहीं देता 

सदियों से गुरुओं पैगम्बरों ने, दिया जो सन्देश 
उसे बहकावे में भुलाना, हमें शोभा नहीं देता