बेशर्मी

ज्यादातर सभी को आप बेशर्मी  से हँसते देखिये  
अपने बोले झूठ पर खूब इतराते देखिये  
बेवफाई का जो हैं ,खुद जीता जागता सबूत 
दूसरों को वफादारी का ,सबक सिखाते देखिये 

खुद अपनी ख़ुशी कहीं भी ,ढूँढ लेते हैं जनाब 
दूसरे की ख़ुशी पर, दिल पे साँप लोटते देखिये 
वो तो किसी ने किया नहीं ,हमारे लिए कुछ भी !
जो खुद से हासिल किया,उस पर राल टपकाते देखिये  

वो जो दूसरे की ख़ुशी को पूरा डस गया 
उसको आज साँप सा फुफकारते देखिये 
खुद तो बोला अकड़ के 'जी ली अपनी ज़िन्दगी' हमने
दूसरा जीने लगा तो नागवार गुजरते देखिये   
 
अमानवीयता की हद से खुद ,गुजर गया जो कईं बार 
उसे 'किया ही क्या है मैंने' का गीत,हज़ार बार गाते देखिये  
सहने वाले सहते रहे हद से गुजरता रहा वो 
उस को हर रोज़ नयी हद पार करते देखिये  

बहुत हुआ अब ! ज़रा संभल !
रोज़ तुझे ही क्यों गम सहते हुए देखिये  
अकेलापन बेइज़्ज़ती से है बेहतर यार !
दिल तड़प जाता है ! तुझे तन्हाई में रोते देखिये !


हमसफ़र

क्या जाने मुझे कितने, दर्द में डुबो गया 
आज वो नाराज़ होकर पीठ करके सो गया... 
आंसुओं में भीगा, चेहरा था मेरा मगर !
मुँह धुला समझ कर वो, अपने में ही खो गया...
जिसको अपना समझ के ,बिता दी हमने एक उम्र   
किस्मत के इम्तिहान में वो, फिर से जीरो हो गया  ...  
मिट्टी उसकी और हमारी दोनों की करामाती है 
ना वो बदला ,ना ही हम ,आज साबित हो गया ...
हमको समझ ना आया वो, और ना उसको हम 
ना जाने कैसे ये लम्बा सफर ,यूँ ही तय हो गया ...

नवजीवन

चेहरे  को  छूती  ये  ठंडी  हवा  
छायी मस्त  ये  काली  घटा  
दिल  पूछता  है  मुझसे  ये 
मुझे  कहाँ  ले  आयी ? तू ये बता!
  
अंधे  कुँए  से  बाहर  कौन  
तुझे  ले  के  आया   ये  बता 
गुनगुनायी  दिल  ने  फिर  कोई  सरगम नयी !
मुस्कुराने  लगी  है  आँखें 
राज़  क्या  है  ये  बता 
 
हवाओं   की  सरगोशियां 
लहलहाना  पेड़ों   का 
रिमझिम  बूंदें  चेहरे  पर 
लायी  'नवजीवन' का  पता  

सितम

वक़्त  के खूबसूरत  'सितम 'देखिये 
हम  ही  ना  रहे  'हम'  देखिये 
चारों   तरफ   बिखरी  थीं  खुशियां  मगर 
हम थे  खुद  में  मगन  रात  दिन देखिये 

बार  बार  खुशियों  ने  दस्तक दी  दिल पर 
ना  किया  हमने  खुद  पर  करम  देखिये 
प्यार  यूँ  सबसे   किया  हमने  ऐसे  कि  हम
भूले  खुद  को  ही  हम  'बेरहम'  देखिये 

उम्र  का  हर  पड़ाव  खूबसूरत  तो  है 
दिल  में  शिद्दत  से  जीने  की चाहत  भी  है 
पर  कोई  हमारा  बने  ना  बने 
दिल  की  ख्वाहिश  हुई  है  ख़तम  देखिये 

पेड़ों  से  झड़ते  हुए  फूल  यूँ 
मोती  से  धरती  पे  बिखरे  हुए 
देखूं  कैसे  इन्हें ? फूलों  की  बेकद्री  या 
है  धरती  पे  इनका  करम  देखिये 

वक़्त  के खूबसूरत  सितम देखिये 
हम  ही  ना  रहे  'हम'  देखिये

रात

इसकी बात, उसकी बात, ना जाने किस किसकी बात  
करवटें बदलते गुजरी, हाय मेरी तमाम रात! 
उफ़ ये बेचैनी है कैसी !क्या बेकरारी का सबब ?
बेचैनी कम हो जाएंगी क्या ?गर छोड़ दूँ ख्वाहिशों का साथ !

मैं नहीं चाहती ,कैसी भी  !कोई शय चुराए नींदें मेरी ! 
मैं तो बस चाहूँ पुरसुकून प्यारी सी एक चांदनी रात 
जान के भी अनजान बन पाने की जो हैं ख्वाहिशें !   
वजह वही हैं जो ना सोने देंगी मुझको सारी रात 

कर सके तो कर ले यारा अब तो खुद पर भी यकीन 
वरना कर दे अलविदा तू अपनी नींद आज की रात  
इसकी बात उसकी बात ना जाने किस किसकी बात  
करवटें बदलते गुजरी हाय मेरी तमाम रात .......

क्या हो तुम

रब /राम / परमात्मा /गॉड / कृष्ण ! क्या हो तुम !
तपती हुई रेत पर पानी की बूँद तुम 
जीवन की गर्म हवाओं में शीत पवन तुम 
हम सभी प्राणियों का भार सहती धरती तुम 
सभी के संरक्षक सर की छत आकाश तुम  
दिन भर के थकेहारे को सुकून भरी रात तुम 
घोर अंधियारे को चीरते हुए चाँद सितारे तुम 
अँधेरे को काटते उम्मीद की किरण लिए भोर का सूरज तुम 
लहलहाते खेत तुम बागों की बहार तुम 
मज़दूर का पसीना तुम ! किसानो की मेहनत तुम 
सैनिकों की वीरता तुम ! इंसानों की बुद्धि तुम 
माँ बाप गुरु तुम ! हर प्यार करनेवाला हाथ तुम 
हर मज़बूत बनानेवाला वार तुम ! वार भी, शत्रु भी तुम ! 
जीते जीते थक गए तो मौत की मीठी नींद तुम 
हो तुम कहाँ नहीं ! हर स्वास हर धड़कन में तुम 
अदृश्य भी दृश्य भी ! हो शाश्वत हर सत्य भी !
क्यों तुम्हें पुकारूँ मैं !वाणी की हो जब शक्ति तुम !
कुछ ऐसा करो परमपिता ! हो मुझ पर तेरी कृपा ! 
मैं कहीं भी ना रहूं ,रहो तो सिर्फ तुम ही तुम !

चुनावों का मौसम

ए काव्य मन ! तेरी कलम ना हो राजनीति से प्रेरित  
है चुनावों का मौसम  !
तेरे ज्ञान की कुल्हाड़ी से तेरी शाख ही ना कट जाए 
है चुनावों का मौसम  ! 
तू तो है मानव संवेदनाओं भावनाओं से जुड़ा हुआ 
तेरा हर गीत प्रेम अपनेपन से था गुँथा हुआ 
भ्रमित भी हो सकता है तू! इस बात का विचार कर
संभल ! झूठ सच का कॉकटेल समाज में मिला हुआ  
यहाँ  है चुनावों का मौसम  !
सरकारें आयी गयी, स्थिति कमोबेश एक सी !
गरीब और गरीब ! अमीर और अमीर हो गया ! 
ना जाने प्यार भाईचारा विश्वास कहाँ खो गया ? 
कड़वा ना बोले था कभी जो! बातें करे ज़हर सी !
सुन ! है चुनावों का मौसम !
देख सड़कों पे है जो हममे से एक! तुझसा मुझसा ही तो है!
हर नुकसान कुर्बानी होती हमेशा उसी की  है 
तू तो बस जनता को सही राह दिखा ! गर हो सके! 
चयन करना अधिकार उसका ! समझ उसकी अपनी भी है   
ठीक है ना ! है चुनावों का मौसम !

गुमसुम

सुनो कुछ नहीं चाहिए मुझे तुमसे 
बस अपनी अपेक्षाओं में मत लादो तुम 
जीवन जो रह गया बाकी 
सहजता और सरलता से जीने दो तुम
 
तुम्हारी उम्मीदों पे खरे उतरें 
बहुत लोग हैं ऐसे 
अपनी उम्मीदों के स्तर पे 
हमे मत लाओ तुम

जीवन भर ढेर सी इच्छाएं अपनी 
और ढेर से सपने और उम्मीदें अपनों की 
कुछ पूरी हुई और कुछ नहीं भी 
परेशान ही रहे हम तुम 

तुम भी भरपूर जियो 
और जियें हम भी थोड़ा खुलके  
व्यर्थ है हर पाना खोना 
अगर बैठे हों दोनों गुमसुम 

एक हद तक

प्यार नफरत मुनासिब है एक हद तक 
उसके बाद खुद के लिए ही ज़हर 
बदनीयती बेईमानी बदज़ुबानी 
ज़रूर लाती हैं जीवन में कहर
प्यार की शुरुआत कर खुद से ही 
तभी आएगी खुशनुमा सहर 
तू खुद को बना इतना मज़बूत 
जैसे ज़मीन में गहरा शज़र
तीरगी को मिटा ज़िन्दगी से ऐसे  
दुश्मन भी मज़बूर हो तारीफ़ पर 

बेटी

तू मेरी लाड़ली
मेरा प्यार तू 
है दुलार तू
रब की नेमत तू 
मेरा सहारा तू 
मेरी इज़्ज़त तू 
मेरी हिम्मत तू
सिर्फ एक दिन नहीं 
पूरी ज़िन्दगी तू 
तेरे लिए मेरा सब कुछ 
मेरे लिए है सब कुछ तू 
मेरी आन बान शान तू 
मेरी हर दुआ लगे तुझे 
करे जग में ऊंचा नाम तू !
प्यार से जीवन भरा रहे 
ममता की है मिसाल तू 
कभी बुरी नज़र ना लगे तुझे 
बने बेटियों में मिसाल तू!
तू मेरी लाड़ली
मेरा प्यार तू