देशभक्ति का मर्म

देशभक्ति का मर्म तू जान !
संविधान का कर सम्मान 
फिर कह मेरा भारत महान 
सर्वधर्म सद्भाव ,प्रेम विश्वास 
इनसे ही मिलता है समाधान 
संविधान का कर सम्मान 
     फिर कह मेरा भारत महान 
        देशभक्ति का मर्म तू जान !


घटते जाते जीवन मूल्य 
सच्ची देशभक्ति होती अमूल्य 
परिभाषा क्यों बदली इसकी 
झूठा क्यों लगता गुणगान 
 संविधान का कर सम्मान 
     फिर कह मेरा भारत महान 
        देशभक्ति का मर्म तू जान !

  अशिक्षा बेरोज़गारी और इलाज़ 
इनके क्षेत्र में पिछड़ा समाज 
अब महंगाई ने कमर तोड़ दी 
देश बाहर कैसे पाए सम्मान 
संविधान का कर सम्मान 
      फिर कह मेरा भारत महान 
         देशभक्ति का मर्म तू जान !

संविधान और कानूनों में संशोधन 
तो होते ही आये वर्षों से 
फिर क्यों शहीदों किसानों से 
बड़ा हुआ सरकार का मान 
संविधान का कर सम्मान 
     फिर कह मेरा भारत महान 
         देशभक्ति का मर्म तू जान !

हाँ बहुत लोगों की कुर्बानी 
मिली तभी ये देश खड़ा 
मुट्ठी भर स्वार्थी लालची 
लोगों ने किया अपमान 
संविधान का कर सम्मान 
    फिर कह मेरा भारत महान 
         देशभक्ति का मर्म तू जान !


यूँ तो हम अपनी सेनाओं 
पर  अमिट गर्व करते हैं  
गलत नीति कूटनीति की  
भरपाई वो सदा करते हैं 
कहाँ चला जाता है तब 
देश के वीरों का सम्मान 
संविधान का कर सम्मान 
      फिर कह मेरा भारत महान 
         देशभक्ति का मर्म तू जान !

ज़ुदा होना

सच पास आना बहुत मुश्किल था लेकिन  
तुमसे ज़ुदा होना कोई मुश्किल नहीं था 
मगर ऐसे  हरपल बेतरह तेरा याद आना 
आँसुओं को रोक पाना मुमकिन नहीं था 
          तुमसे ज़ुदा होना कोई मुश्किल नहीं था 

ज़ुदा होने की ख्वाहिश तेरी ही थी लेकिन 
इसरार तेरा ठुकराना भी मुनासिब नहीं था 
जब ज़ुदा हो ही गए हो तो हमें भूल जाओ 
बारहां आवाज़ लगाना भी लाज़िम नहीं था
           तुमसे ज़ुदा होना कोई मुश्किल नहीं था 

वक़्त के साथ बदलीं दिलचस्पियॉँ तेरी लेकिन 
हमें ऐसे अँधेरे में रखना अजी वाज़िब नहीं था
वक़्त और हालात से डरें या बदलें हम नहीं वो
दहशत से मेरा सहम जाना भी मुमकिन नहीं था 
          तुमसे ज़ुदा होना कोई मुश्किल नहीं था 
             ️✍️सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️

मेरा प्यार

मेरा प्यार समंदर सा गहरा ठहरा क्यों 
हरतरफ सागर पर दिल में सेहरा क्यों 
क्या फर्क पड़ता है प्यार मिले ना मिले 
मेरा प्यार इस कदर अंधा बहरा क्यों 
           मेरा प्यार समंदर सा गहरा ठहरा क्यों 

बेरुखी बेपरवाही ही जिसका मंत्र रहा 
मतलब परस्ती जिसका है धर्म रहा
अपने से ऊपर,किसी को ना रखा जिसने 
उसकी मुस्कान बनाये रखने में वक़्त जाया क्यों
         मेरा प्यार समंदर सा गहरा ठहरा क्यों 

हम अपनी परेशानियों में इतना उलझें क्यों  
हम अपनों की परेशानी का सबब बनें क्यों 
मायूसियों को खुद तक ही रखना चाहिए हुज़ूर 
बेशकीमती ख़ुशियों को दरबदर करें क्यों 
          मेरा प्यार समंदर सा गहरा ठहरा क्यों 

खुद से इतनी शिकायत मुझे आजकल क्यों  
खुद से ही इतनी फ़रियाद हर लम्हा क्यों 
थक गयी हूँ आजकल खुद से मतलब रख के 
मुझको मुझसे छीने किसीकी इतनी बिसात  क्यों 
          मेरा प्यार समंदर सा गहरा ठहरा क्यों 

कोई अपना रहे ना रहे अपना, तो क्या 
टूट जाए तेरा कोई प्यारा सपना तो क्या 
पत्थर के दिल पत्थर रहें,ना हों मोम कभी
इतने मर गए अहसास दिल के मगर क्यों 
      मेरा प्यार समंदर सा गहरा ठहरा क्यों 
               -सीमा कौशिक 'मुक्त' 

करवट

कटीं रात करवट बदल बदल 
और दिन भी कटें बेकरार से 
कैसे बचाये मुझे अब कोई 
जब हूँ मैं खुद पशोपेश में
                 कटीं रात करवट बदल बदल 
कैसे किसे अब क्या कहूँ 
ज़िंदा हूँ ,रूह निकल गयी        
वो देखता एकटक रहा 
मैं बुत बनी सी रह गयी
                  कटीं रात करवट बदल बदल 
जो था मेरे ख़्वाबों ख्यालों में 
वो दिखा नहीं मुझे दूर तक  
दर्देदिल हद से गुजर रहा 
झड़ी आँसुओं की लग गयी
                   कटीं  रात करवट बदल बदल 
 ये सिला मिला मुझे प्यार का 
कि कली कली बिखर गयी  
मेरी फूल सी ये ज़िन्दगी 
क्यों इस तरह बिखर गयी
                  कटीं  रात करवट बदल बदल 
सभी को दिलसे चाहा मगर 
कोई भी ना अपना हुआ 
मेरी आरजूएँ इस कदर 
क्यों बेवजह छितर गयी 
             कटीं रात करवट बदल बदल 
सँवारे कोई कैसे अगर   
अपना ही दुश्मन हो गया 
मुस्कराहट मेरे लबों कि क्यों  
उसके दिल की आग बन गयी
              कटीं रात करवट बदल बदल 
वो समझे खुद को शहंशाह 
मुझे कनीज़ घरद्वार की 
तू ही कर खुदा ये फैंसला 
कीमत यही है क्या प्यार की
             कटीं रात करवट बदल बदल 
लब कर लिए हैं खामोश
और सह लिया हर वार भी 
इस दर्देदिल का मैं क्या करूँ 
हर वक़्त करे फ़रियाद सी 
            कटीं रात करवट बदल बदल 

मिल या मत मिल

रूह में ज़ज़्ब हो जाने का दिल हो तो मिल
मगर झूठे दिलासे देने हो तो मत मिल 

मेरी राह में फना हो जाने का जज़्बा  हो तो मिल 
वक़्त पे कदम पीछे हटाने हो तो मत मिल 

मेरे हर डर को हरा सकता हो तो मिल
मेरे दर्द पे पीठ पीछे हंसना हो तो मत मिल
 
मेरा हर ज़ख्म मिटा सकता हो तो मिल 
नया ज़ख्म देना हो तो बिलकुल मत मिल

रंजोगम की दीवार गिरानी हो तो मिल 
बेरुखी की दीवार उठानी हो तो मत मिल 

मिल या मत मिल,मेरे लिए दुआ कर बिस्मिल !

आलिंगन

मौत आलिंगन करे मेरा 
इससे पहले आ ज़िन्दगी !
तेरी बाहों में थोड़ा सुस्ता लूँ 
आ तुझे गले लगा लूँ 

दिन पूरे हुए तो क्या 
कुछ लम्हें ख़ुशी मना लूँ !
तुझे सीने से लगा लूँ 
तेरी बाहों में सुकून इतना
तेरी बाहों में थोड़ा सुस्ता लूँ 
आ तुझे गले लगा लूँ 

तेरी हर बात हर अंदाज़ 
सदा रहा कबूल मुझे 
तेरे सीने पे सर रख 
सारे गम पिघला लूँ 
तुझे साँसों में समा लूँ !
आ तुझे गले लगा लूँ 

हर तरफ खामोशियाँ 
और घड़ी की टिक टिक 
खुद की साँसों को तेरा 
अहसास मैं बना लूँ
आ गले लगा लूँ   
तेरी बाहों में थोड़ा सुस्ता लूँ 

दिन था कभी तो रात भी 
कुछ गम तो खुशियों की बरसात भी 
आंसू तो मुस्कराहट भी 
तुझे हमेशा की चाहत बना लूँ  
आ तुझे गले लगा लूँ 
तेरी बाहों में थोड़ा सुस्ता लूँ 

अनुकूल प्रतिकूल

अनुकूलता आपको निखारती नहीं है 
प्रतिकूलता का आपको धन्यवादी होना चाहिए 
बिन हथौड़े छैनी की चोट कैसे पत्थर तराशे कोई 
मूरत को हथौड़े छैनी का धन्यवादी होना चाहिए 

संघर्षों के कांटे बिछे हों चाहे जितने राह में 
फूल हार मान उन्हें अपना लेना चाहिए 
तेरे मेरे विचार और स्वभाव हो सकते हैं अलग 
समझ के एकदूसरे को साथ चलना चाहिए 

आप रखते हो सभी के दिल का ख्याल 
अपने दिल का भी सदा ख्याल रखना चाहिए 
अपेक्षाएं बन जाती हैं जीवन का ज़हर 
धीरे धीरे कोशिशें कर त्याग देना चाहिए 

चाहत दुनियाँ बदलने की ! खुद बदल पाते नहीं 
अपने आप में  सुधार का प्रयास होना चाहिए 
हम सभी को अनुकूलता प्रतिकूलता सोचे बिना 
भरपूर जीवन जीने का मज़ा लेना चाहिए 

टुकड़े टुकड़े

टुकड़े टुकड़े टूटा है दिल, बिखरे बिखरे हैं ज़ज़्बात 
उसके दिल तक दर्द ना पहुंचा, फिर से लगाये बैठा घात 
टुकड़े टुकड़े टूटा है दिल ...
कैसे क्या क्या सबको कहें जब,दिल में चुभी हुई हो बात 
दिन तो जैसे तैसे बीते, कटती नहीं है बैरन रात 
टुकड़े टुकड़े टूटा है दिल ...
प्यार किया है खेल नहीं कोई, जिसमे होगी शह और मात 
दर्द में डूबे शज़र हैं हम तो ! दर्द है अब हर शाख और पात 
टुकड़े टुकड़े टूटा है दिल ...
दुनियाँ है क्यों  ज़ालिम इतनी, झूठे सारे रिश्ते नात 
ज़हर है जब तो छोड़ दे ना तू,दर्द से क्यों है रखना साथ 
टुकड़े टुकड़े टूटा है दिल ...
मौसम आते जाते रहते, सुख दुःख सर्दी गर्मी बरसात 
रहना ही है सहना ही है, जब तक आत्मा रहे है गात  
टुकड़े टुकड़े टूटा है दिल 

हमदम

मुझको आवाज़ तुम देते रहना 
मेरे हो मेरे रहोगे ये कहते रहना 
उम्र का लम्बा सफर तय किया तुझ संग जाना  
मेरी वफाओं का जवाब तुम बनते रहना 
तेरे बिन दिन तो जैसे तैसे गुजर जाता है 
मेरी हर शाम का साथ तुम बनते रहना 
साथ रहतें हैं तो होते हैं शिकवे शिकायत भी 
नजरअंदाज करके उन्हें हमसे मिलते रहना 
तू मेरी धड़कन मेरी साँसों से रूह तक पहुंचा
अब तो तेरे साथ ही होगा जीना मरना
हमने तन्हाई को साथी बना रखा है
मेरे लिए सीने में तेरे ज़ज़्बात हैं ना? 
ये दोनों हाथ उठा रब से दुआएं माँगूँ 
जब तक हो सांस हमारा साथ हो ना 
कृष्ण की बंसी बजे राधा दौड़ी आये 
वैसे आवाज़ पे तेरी मैं दौड़ी हूँ ना 
मुझको आवाज़ तुम देते रहना 
मेरे हो मेरे रहोगे ये कहते रहना 

तफ़सील

तफ़सील से हमारे बारे में वो बताता चला गया                 
हम टोकते रहे लेकिन वो सुनाता चला गया 
मालूम नहीं था उसे जान गए हैं हम खुद को 
मगर वो फिर भी हमें हमसे मिलाता चला गया

खुद को तो जानते थे मगर न जानते थे उसे 
बेख़बरी में वो खुद से मिलाता चला गया  
हम खुद से ज़्यादा भरोसा करते थे जिस पर 
हमदर्दी का ज़नाज़ा वो उठाता चला गया 

हमारे रंजोगम से नहीं था उसे कोई लेना देना  
वो हमे अपने दुःख दर्द सुनाकर चला गया 
जिन्हें बड़ी आस है इस ज़माने से सुन लो 
वो बुज़ुर्गों से मिला सारा मुग़ालता चला गया
 
वो किरदार बहुत ऊँचा है इसपे कोई शक न हमे
खुद पे बात आने पे क्यों प्यार का लहज़ा चला गया  
शिकवे शिकायतों को रखो दिल में है बेहतर 
सोचो क्या होगा जो वो हमे रुलाता चला गया 

हमें भी आदत थी बहुत हर दर्द पे कराहने की 
जब देखा दर्द ज़माने का अपना चला गया 
रूठ कर हमसे ना जाओ भरी महफ़िल से  
हम रूठे तो कहोगे मैं मनाता चला गया