अनमोल

ज़िन्दगी अनमोल है, सदा ज़िन्दगी को चुनो । 
गम की अँधेरी रात में, बढ़ते रहना ही चुनो ।।
 
आँधियाँ तूफ़ान रस्ता रोकलें कितना मगर ।   
हार न मानो हमेशा , उनसे लड़ना ही चुनो  ।। 

दिल की हर आवाज़ को, क्यों अनसुना करते रहे । 
मोल जानोगे अगर, फिर ना करोगे अनसुना।। 

सोच की दलदल में फँसना, है सिरे से ही वृथा।  
दुनिया बदलने की जगह, ख़ुद को बदलना ही चुनो ।। 

क्या सज़ा दोगे किसी को, क्यों हो तुम सबसे नाराज़। 
आज अब अनमोल है, बस आज और अब चुनो।।
       ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️

मयस्सर

वो लम्हें नहीं मयस्सर,जिन्हें सीने से लगा लूँ 
आ पास आ ज़िन्दगी, आ गले तुझे लगा लूँ 

कब रात आयी कब दिन, कब हुई सुबह-ओ-शाम 
कैसे गुज़रा वक़्त है ये, इसे कैसे मैं बचा लूँ  

इस दिल ने चाहा जो भी, वो मिला नहीं कभी भी 
दिल रोये और चीखे, इसे कैसे मैं मना लूँ 

मेरे दर्द की दवा भी, किसी सूरत हो न पायी   
ये वक़्त बने मरहम, थोड़ा मैं भी मुस्कुरा लूँ 

आसान है दर्द में, सुन 'मुक्त' यूँ कराहना 
हिम्मत से मुस्कुरा कर, दोनों जहाँ बना लूँ   
                           ✍️सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️

देशभक्त

देशभक्तों की आँखों में, अंगार शोभा नहीं देता 
होंठों पर नफरत का ज़हर, शोभा नहीं देता 

आप धार्मिक हैं तो, धर्म भी समझा करिये 
धर्म के नाम पर, दंगा शोभा नहीं देता 

कौन हैं वो लोग जो, नफरत की करें पैरवी 
ऐसे लोगों का साथ, हमें शोभा नहीं देता 

इंसानियत का धर्म, सब धर्मों से है ऊपर 
इसकी अवमानना का रवैया, शोभा नहीं देता 

दूसरों के दिल पर, दर्द की दस्तक मत दो 
वर्ना ख़ुद दर्द में कराहना, भी शोभा नहीं देता 

सदियों से गुरुओं पैगम्बरों ने, दिया जो सन्देश 
उसे बहकावे में भुलाना, हमें शोभा नहीं देता  

ध्यान

चाहे जितनी भी दूरी थी 
चाहे कितनी मज़बूरी थी 
पास रहे फिर भी दूरी थी 
तेरे होने का अहसास रहा 
मुझे अक्सर तेरा ध्यान रहा 

कब कैसे बच्चे बड़े हुए 
अपने शत्रु बन खड़े हुए 
कब सेहत ने दिया धोखा 
दिल ने बार बार रोका 
मुझे अक्सर तेरा ध्यान रहा 

इक छोटा सा घर बनाना था 
प्यार से उसे महकाना था 
कभी पूर्ण स्वप्न कर पाओगे  
दिल खोल मुझे अपनाओगे 
मुझे अक्सर तेरा ध्यान रहा

टूटे बिखरे सपने मेरे 
आधी अधूरी ख्वाहिश हैं  
माँ बाप जहाँ को छोड़ गए   
बच्चों का अपना जीवन है  
मुझे अक्सर तेरा ध्यान रहा 

हालात रहे चाहे जैसे 
कभी ऐसे या कभी वैसे 
बस तेरा ही आह्वान रहा 
मुझे अक्सर तेरा ध्यान रहा
               ✍️सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️


अधिकार

कहीं भी मैं चली जाऊँ कहूँ क्या याद आने में 
जलाने के नए किस्से  बहाने भी बनाने में 

कसम खाने खिलाने के बहाने दिल लुभाना क्यों 
ज़माना भी बुरा लगता  हमें  हँसने हँसाने में

समझ पाओ अजी समझो, नहीं अधिकार तुम्हारा   
मगर क्यों वारते हो दिल  हमारे  मुस्कुराने में

लुभाने को बहुत हैं तितलियाँ सारे जहाँ मालिक 
मज़ा क्या है उँचाई से किसी को भी गिराने में              

इसे मेरी ज़ुबानी प्यार का इज़हार मत समझो 
बड़ा आता मुझे गुस्सा  तुझे अपना बताने में 
            ✍️सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️

राहत

हालातों का गुलाम 'दिल', राहतों का तलबगार रहा 
उलझी रही ज़िन्दगी मेरी, उलझा सा किरदार रहा 
कौन चाहता है अपने, दर्देदिल की नुमाइश करना 
बर्दाश्त से बढ़ने लगा दर्देदिल, तभी चीत्कार रहा 
ज़िन्दगी के मंच पे बदहवास खड़े हम सोचा किये 
कसूर हमारा ही था क्या, जो जीना सोगवार रहा 
स्कूलों में जीवन जीने का हुनर भी सिखाया जाए 
इस हुनर के बिना हमारा जीना हर तरह दुश्वार रहा  
सीधा सच्चा होना इस दुनिया में गुनाह सबसे बड़ा  
या रब ! यही गुनाह हमसे क्यों यहाँ बारम्बार हुआ  
हमने छोड़ दिया पुरानी बातों यादों किस्सों को मगर 
उनका हमें छोड़ने से हर बार क्यों इंकार रहा  
अच्छे लोगों आओ जियें भरपूर नयी दुनिया बसायें, 
हमारा ही हर बार इक इक से यही इसरार रहा  

बैसाखी त्यौहार

*मुबारक बैसाखी त्यौहार, चल भंगड़ा डालो यार*  
*मेरे देश की पावन मिट्टी, देती है नित उपहार* 
*मेहनत का इनाम है देती, है भरे खूब भण्डार*  
*फसलें पकें खेत में तभी, चेहरों पर आती रौनक* 
*नृत्य संगीत लौटे जीवन में, हों खुशियाँ बेशुमार*
*मुबारक बैसाखी त्यौहार, चल भंगड़ा डालो यार*  
   
*गूँजा  लोकगीतों  से  देखो  धरती  और  आसमान* 
*फसल कटे धन मिले तभी, सब पहने नवीन परिधान*
*नित उत्सव होते फिर घरों में जमती शाम-ए-महफ़िल* 
*नाचे मनमयूर  देख के  विभिन्न मधुर सरस पकवान*
*मुबारक बैसाखी त्यौहार, चल भंगड़ा डालो यार*  
           ✍️सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️

इंतज़ार

मैं ज़िंदा हूँ बस इंतज़ार में हूँ 
तेरे तबस्सुम तेरी याद में हूँ 
देख ले इक बार मेरी तरफ 
तेरी वफ़ा के इंतज़ार में हूँ 
कौन कहे तुझमें वफ़ा नहीं 
कौन जाने तेरी पेचीदगियाँ 
अभी तक याद है ज़ुल्म यारा 
तेरे प्यार के इंतज़ार में हूँ 
हरबार इक नया दग़ा तेरा  
हरबार इक नया ज़ख्म तेरा 
फिर भी साथ हूँ सालों से 
क्या अपने क़त्ल के इंतज़ार में हूँ 
या तेरे रहमोकरम के इंतज़ार में हूँ 
मैं ज़िंदा हूँ बस तेरे इंतज़ार में हूँ 

रात

ये रात महकती है, बात बहकती है 
       नैन झुके हैं मेरे, लब खामोश जी
कभी तो आ इस जीवन में बहार बन 
      प्यार के सरूर में, हुए मदहोश जी 

रूठने मनाने का, सिर्फ बहाना था
     पास बुलाना था, झूठा है रोष जी  
तेज तेज साँसें हैं, दिल लगा झूमने 
   कैसे बताऊँ अब, नहीं मुझे होश जी

प्यार की कहानी,धड़कन की ज़ुबानी 
     धीरे से सुनो मुझे, लो आगोश जी
ये रात महकती है, बात बहकती है 
      नैन झुके हैं मेरे, लब खामोश जी
            ✍️सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️

है तो है

हमें तुमसे प्यार है तो है 
हमें ख़ुद पे एतबार है तो है
फर्क नहीं पड़ता तू चाहे न चाहे 
हमारी चाहत बरकरार है तो है 
कोई हमारे साथ हो न हो 
रब हमारे साथ है तो है 
हम कितना भी करे सबके लिए मगर  
सभीको हमसे शिकायत है तो है 
छोड़ो ये सुख-दुःख का रोना धोना 
सुबह के बाद शाम, दिन के बाद रात है तो है 
आज पा लिया हो चाहे जितना 
कल बहुत कुछ पाने का अरमान है तो है 
माफ़ी मांगी हों लाख तुमने गुनाहों की 
मगर दिल में हमारे कसक है तो है 
माना नहीं हक़ हमारा किसी की ज़िन्दगी पे 
मगर कुछ बातों पे ऐतराज़ है तो है 
लोगों को भाती होगी समझदारी लेकिन 
हमें मासूमियत लुभाती है तो है 
छोड़ो घुमा फिरा के बातें करना ज़नाब 
आपको हमसे प्यार है तो है 
आती हैं हमें कईं जुबानें लेकिन 
अपनी हिंदी से प्यार है तो है 
कोई भी जाति-धर्म हो मेरा मगर 
इंसानियत से प्यार है तो है 
घर पर तिरंगा नहीं फहराते हम 
पर दिल में तिरंगा है तो है 
देशभक्ति के दावों से लाख बचें 
मगर देशभक्ति रगों में है तो है 
कहीं भी हो जन-मन-गण हो साथियों 
मन राष्ट्रीय गान गुनगुनाता है तो है …
          ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️