मुमकिन

है मुमकिन हर दर्द रंजो गम का बोझ उठा ले कोई   
नहीं मुमकिन गिरी हुई सोच को उठा लेना  

है मुमकिन किसी रिश्ते में प्यार के बगैर रहे कोई  
नहीं मुमकिन विश्वास के बगैर  रहना

मगर रहते हैं कुछ लोग प्यार विश्वास के बिना भी 
इसी को कहते हैं रब की मर्ज़ी को निभा लेना
 
फ़क़ीर लगते नहीं ये लोग, होते हैं उन जैसे ही दीवाने 
झट रब की मर्ज़ी में, अपनी मर्ज़ी मिला लेना 

मुमकिन है मिटा दो यादों का, कारवां तुम ज़ेहन से यारा 
नहीं मुमकिन हमें, अपने दिल से मिटा देना  
              ️✍️सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️ 

अनमोल

ये कविता उन सभी बच्चों को समर्पित जो हमसफ़र के लिए सुंदरता को अहम् स्थान देते हैं 
और बाद में ख़ुद को विषम परिस्थिति में घिरा पाते हैं  ...........

चेहरे बदन की ख़ूबसूरती, सराही जाती है यदि 
सीरत की भी ख़ूबसूरती, अब सराही जानी चाहिए
 
कोई पैसे पर ही रखे निग़ाह, ये गलत है हुज़ूर 
सच्चे प्यार की कीमत ही, अनमोल होनी चाहिए
 
चले गए ज़माने, कागज़ी ख़ूबसूरती के जहान से 
पुरज़ोर मेहनत की भी तो, कद्र्दानी होनी चाहिए 

ख़्वाबों से ही नहीं चलती, ये दुनियाँ सुन यार मेरे   
ख़्वाबों के लिए ज़मीनी, हक़ीक़त नहीं खोनी चाहिए 

क्षणिक सुख आत्मिक सुख, के आगे गौण है सर्वदा    
आत्मिक सुख का दाम, सदा अनमोल होना चाहिए 
              ️✍️सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️ 

खण्डहर

   "खण्डहर" 
इमारत बुलंद थी 
खण्डहर बता रहे हैं 
मगर अब कहाँ हैं वो 
इमारतें बन गयीं खण्डहर 
खण्डहर यादों के 
खण्डहर ज़ज़्बातों के 
हर तरफ नीरव ख़ामोशी 
अहसास धुंधले अतीत का 
नश्वरता क्षणभंगुरता का 
मगर चेता रही हैं हमें 
है एक एक क्षण कीमती 
हर पल जियो भरपूर जीवन 
खण्डहर होने से पहले 
मस्त नदी सा प्रवाह 
बिना दिल से लगाए 
छोटी बड़ी बातें 
        (स्वरचित कविता)
              ️✍️सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️ 

सुरमयी शाम

सुरमयी शाम इंतज़ार में हर लम्हा
तेरे प्यार का अहसास हर लम्हा
सात सुरों की महफ़िल सजाई है
इंतज़ार में धड़का दिल हर लम्हा
        सुरमयी शाम इंतज़ार में हर लम्हा

कोई कहता रहे हमें अब कुछ भी
दिल करे है तुम से बात हर लम्हा
हम हाथों में हाथ लिए बैठे हों
सुलगें मीठे जज़्बात हर लम्हा
         सुरमयी शाम इंतज़ार में हर लम्हा

हसीं पलकों पर शाम सजाई है
आजा अब जान पे बन आयी है
सराबोर हो जाएँ प्यार के रंगों से
दिल से दिल की बात हर लम्हा
          सुरमयी शाम इंतज़ार में हर लम्हा

️

इश्क़

ए इश्क़ हमें भी देख ज़रा 
हम पलकें बिछाये बैठे हैं 
हँस कर देख ले एक नज़र 
हम जान लुटाये बैठे हैं
     ए इश्क़ हमें भी देख ज़रा 
     हम पलकें बिछाये बैठे हैं 

सूना सूना मन का अँगना 
सूनी सूनी दिल की गलियाँ   
सूनी आँखें तकती राह तेरी 
हम ख्वाब सजाये बैठे हैं
    ए इश्क़ हमें भी देख ज़रा 
    हम पलकें बिछाये बैठे हैं 

क्या है जीना इश्क़ बिना 
क्या है मरना इश्क़ बिना 
है इश्क़ इबादत अब मेरी 
हम हाथ उठाये बैठे हैं
     ए इश्क़ हमें भी देख ज़रा 
     हम पलकें बिछाये बैठे हैं 

यूँ इतराना तेरा कैसा 
यूँ इठलाना तेरा कैसा 
जीना नहीं यारा तेरे बिना  
हम आस लगाए बैठे हैं 
    ए इश्क़ हमें भी देख ज़रा 
    हम पलकें बिछाये बैठे हैं 

तेरा गम का है रिश्ता सही 
तेरे साथ है गम मंज़ूर हमें 
तुझ से कैसी पर्दादारी 
हम साथ निभाए बैठे हैं 
    ए इश्क़ हमें भी देख ज़रा 
    हम पलकें बिछाये बैठे हैं 
              ️✍️सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️ 


आहिस्ता

मेरे दिल का गुलाब खिल रहा, आहिस्ता आहिस्ता
तेरा प्यार कर रहा दिल पर असर, आहिस्ता आहिस्ता
तेरा इंतज़ार किया है बहुत यारा
हो रहा तू दिल के करीब, आहिस्ता आहिस्ता

दूर तक खिल रहे है फूल ही फूल
महक रहा है ये तन मन, आहिस्ता आहिस्ता
रात में चाँद को मैं तकती रही देर तलक
चाँद शरमाया आँखों से, आहिस्ता आहिस्ता

तारों की भी हिम्मत देखो
पूछते हैं कौन है वो, आहिस्ता आहिस्ता
हम तो समझे थे हो गए पत्थर हम
कैसे हुए मोम हम, आहिस्ता आहिस्ता

इतना मीठा है क्या प्यार का अहसास
रूह भी महके हरदम, आहिस्ता आहिस्ता
सिर्फ नज़र आये वो, कोई और नहीं
हम तो रहने लगे मदहोश, आहिस्ता आहिस्ता

गांधीजी का सन्देश

गांधीजी के बलिदान दिवस पर भावभीनी श्रद्धांजलि 
🙏💐🙏💐🙏💐🙏💐🙏💐🙏💐🙏💐🙏
        💐गांधीजी का सन्देश 💐
सोशल मीडिया,टीवी या फिर हो अखबार 
जहाँ देखो वहां दिख रहा नफरत का प्रचार 
शर्मिंदा हैं हम सब भूले ,गांधीजी का सन्देश ! 
जाति, वर्ण, धर्म पर क्यों बँट रहा मेरा देश ? 

गांधीजी ने चेताया, ठीक नहीं !"आँख के बदले आँख" 
इस नीति पर चले तो अंधा हो जाएगा स्वदेश 
ईर्ष्या, द्वेष ,बदले की भावना, रखो दिल से दूर
चाहें कितनी मुश्किलें आएँ, रोज़ बदल कर वेश। 

कभी न करो जीवन के मूलभूत सिद्धांतों पर समझौता 
छोड़ो आवेश ! मानो लो अहिंसा का हितोपदेश    
वो भी कहते थे, गलत बात पर दर्ज करो विरोध 
कभी वहां न  सर को झुकाओ, हों जहाँ गलत निर्देश  

सत्याग्रह और असहयोग की रणनीति ,थी बहुत ही ख़ास 
आत्म चेतना ,आत्मज्ञान का जन-जन में किया विकास 
सादगी,अहिंसा पहचान जिनकी थी,वो राष्ट्रपिता हमारे हैं !
उनके दिए ज्ञान को भूला ? किस राह चला ये देश ?  

अपने सिद्धांतों के लिए जिसने जान करी क़ुर्बान !
ऐसे महात्मा राष्ट्र पिता को कोटि कोटि प्रणाम।   
             ️✍️सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️

देशभक्ति का मर्म

देशभक्ति का मर्म तू जान !
संविधान का कर सम्मान 
फिर कह मेरा भारत महान 
सर्वधर्म सद्भाव ,प्रेम विश्वास 
इनसे ही मिलता है समाधान 
संविधान का कर सम्मान 
     फिर कह मेरा भारत महान 
घटते जाते जीवन मूल्य 
सच्ची देशभक्ति होती अमूल्य 
परिभाषा क्यों बदली इसकी 
झूठा क्यों लगता गुणगान 
 संविधान का कर सम्मान 
     फिर कह मेरा भारत महान 
अशिक्षा बेरोज़गारी और इलाज़ 
इनके क्षेत्र में पिछड़ा समाज 
अब महंगाई ने कमर तोड़ दी 
देश बाहर कैसे पाए सम्मान 
संविधान का कर सम्मान 
      फिर कह मेरा भारत महान 
संविधान और कानूनों में संशोधन 
तो होते ही आये वर्षों से 
फिर क्यों शहीदों किसानों से 
बड़ा हुआ सरकार का मान 
संविधान का कर सम्मान 
     फिर कह मेरा भारत महान 
हाँ बहुत लोगों की कुर्बानी 
मिली तभी ये देश खड़ा 
मुट्ठी भर स्वार्थी लालची 
लोगों ने किया अपमान 
संविधान का कर सम्मान 
    फिर कह मेरा भारत महान 
यूँ तो हम अपनी सेनाओं 
पर  अमिट गर्व करते हैं  
गलत नीति कूटनीति की  
भरपाई वो सदा करते हैं 
कहाँ चला जाता है तब 
देश के वीरों का सम्मान 
संविधान का कर सम्मान 
      फिर कह मेरा भारत महान 
         देशभक्ति का मर्म तू जान !

ज़ुदा होना

सच पास आना बहुत मुश्किल था लेकिन  
तुमसे ज़ुदा होना कोई मुश्किल नहीं था 
मगर ऐसे  हरपल बेतरह तेरा याद आना 
आँसुओं को रोक पाना मुमकिन नहीं था 
          तुमसे ज़ुदा होना कोई मुश्किल नहीं था 

ज़ुदा होने की ख्वाहिश तेरी ही थी लेकिन 
इसरार तेरा ठुकराना भी मुनासिब नहीं था 
जब ज़ुदा हो ही गए हो तो हमें भूल जाओ 
बारहां आवाज़ लगाना भी लाज़िम नहीं था
           तुमसे ज़ुदा होना कोई मुश्किल नहीं था 

वक़्त के साथ बदलीं दिलचस्पियॉँ तेरी लेकिन 
हमें ऐसे अँधेरे में रखना अजी वाज़िब नहीं था
वक़्त और हालात से डरें या बदलें हम नहीं वो
दहशत से मेरा सहम जाना भी मुमकिन नहीं था 
          तुमसे ज़ुदा होना कोई मुश्किल नहीं था 
             ️✍️सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️

मेरा प्यार

मेरा प्यार समंदर सा गहरा ठहरा क्यों 
हरतरफ सागर पर दिल में सेहरा क्यों 
क्या फर्क पड़ता है प्यार मिले ना मिले 
मेरा प्यार इस कदर अंधा बहरा क्यों 
           मेरा प्यार समंदर सा गहरा ठहरा क्यों 

बेरुखी बेपरवाही ही जिसका मंत्र रहा 
मतलब परस्ती जिसका है धर्म रहा
अपने से ऊपर,किसी को ना रखा जिसने 
उसकी मुस्कान बनाये रखने में वक़्त जाया क्यों
         मेरा प्यार समंदर सा गहरा ठहरा क्यों 

हम अपनी परेशानियों में इतना उलझें क्यों  
हम अपनों की परेशानी का सबब बनें क्यों 
मायूसियों को खुद तक ही रखना चाहिए हुज़ूर 
बेशकीमती ख़ुशियों को दरबदर करें क्यों 
          मेरा प्यार समंदर सा गहरा ठहरा क्यों 

खुद से इतनी शिकायत मुझे आजकल क्यों  
खुद से ही इतनी फ़रियाद हर लम्हा क्यों 
थक गयी हूँ आजकल खुद से मतलब रख के 
मुझको मुझसे छीने किसीकी इतनी बिसात  क्यों 
          मेरा प्यार समंदर सा गहरा ठहरा क्यों 

कोई अपना रहे ना रहे अपना, तो क्या 
टूट जाए तेरा कोई प्यारा सपना तो क्या 
पत्थर के दिल पत्थर रहें,ना हों मोम कभी
इतने मर गए अहसास दिल के मगर क्यों 
      मेरा प्यार समंदर सा गहरा ठहरा क्यों 
               -सीमा कौशिक 'मुक्त'