आत्ममुग्ध

क्या हो जाता तुम जो होते भी
वो तो तुम्हारे होते हुए भी तनहा थी
कर पाते उसके ज़ज़्बातों का अहसास
दे पाते उसके तन को आराम मन को चैन
तुम जो होते भी तो क्या हो जाता…….
तुम्हे तो चाहिए था हरवक्त हाज़िर एक शख्स
जो आये और आकर हुक्म बजा लाये
वो करे बिलकुल वैसा जैसा तुम चाहो
वो बातें भी करे उतनी जितनी तुम चाहो
वो भी तुम्हारी पसंद की!
तुम जो होते भी तो क्या हो जाता ……..
जिसे कर पाओ तुम
ज़लील वक़्त बेवक़्त
जिसे ठहरा सको तुम अपनी
नाकामियों का ज़िम्मेदार
जिसे याद ना आये अपनों की जिन्हे वो चाहे
जिनसे रिश्ते निभाने की ज़रुरत नहीं
उसे तो याद करना है तुम्हे और तुमसे जुड़े तमाम रिश्ते
जिनसे निभाना ही है
तुम जो होते भी तो क्या हो जाता…….
क्या बीता वक़्त लौट आता
क्या सब ठीक हो जाता
क्या दिए घाव भर जाते
क्या फासले मिट जाते
अगर हाँ तो आ जाओ !वर्ना रहने ही दो !
और मुझे कहने दो
तुम जो होते भी तो क्या हो जाता…….

नशे में चूर

नशे में चूर दीवाना है तू !
सब कुछ तेरी सहूलियत से नहीं हो पायेगा
तू जब चाहे आएगा जब चाहे जाएगा 
प्यार तू जब करना चाहे जिससे करना चाहे सब ठीक 
दूसरे के प्यार का कोई जवाब नहीं आएगा 
प्यार और समझौतों का हाथ ठुकरा दिया कई बार 
तू क्या समझा चाहा हुआ तेरा हर बार हो जाएगा 
खुशकिस्मत है कि तुझे प्यार करें बहुत लोग 
वरना तेरे गुनाह कौन भूल पायेगा
नशे के नाम किया ज़िन्दगी का बड़ा हिस्सा    
क्या अपनों को हमेशा यूँ ही तड़पाएगा 
पत्नी और बच्चे याद करते हैं तुझे 
बच्चे बड़े हुए तो वो प्यार नहीं पायेगा 
हाथ पैर थक जाते हैं एक दिन ,अभी अहसास नहीं तुझे 
बाद में उन्हें ताने सुनाएगा, प्यार चाहेगा 
दीवाने स्वार्थ में मत डूब गले तक 
समय बदला तो खुद को भी पहचान नहीं पायेगा 
सभी बेवक़ूफ़ लगते हैं तुझे अभी 
पैसे के अलावा क्या कोई भाषा तू समझ पायेगा 
ख़ुशी गम दोनों में पीने वाले 
गम क्या पीने से ख़त्म हो जाएगा
नशे से निकल वास्तविकता की धरती पे आ 
वक़्त निकला तो बस पछतावा ही रह जाएगा 

खिलाड़ी





वो समझता था खिलाडी है वो 
बहुत अच्छा खेलता है 
क्या खूब चालें हैं उसकी 
कितनी सहजता से झूठ बोलता है 
दोहरी ज़िन्दगी जीता था वो,बखूबी 
समाज की आँखों में धूल झोंकता है 
पर एक दिन रब सह ना पाया, उसकी बदमाशी
अब रात दिन उसकी पोल खोलता है 
जो जानते हैं सब उसके बारे में
वो उन्हीं के आगे अपनी ताल ठोकता है 
हँसते हैं सब मन ही मन में, ये सुनकर 
वो फंस चुका जाल में ! पर राज़ कौन खोलता है 
अब खिलाडी के साथ कोई खेल खेलता है 

नाशुक्र नाखुदा

वो बोला
 " तुझसे तेरा घर बनाया नहीं गया "
क्या कहूं उससे
 कि उसे अपनाया नहीं गया !!
दिल चीखता रहा
 चिल्लाता रहा 
दिल का जज्बा होठों पे
 लाया नहीं गया
हर वक़्त यही जिद
 उसे अपना रखने की 
क्यों, क्या जिंदगी का
 वक़्त जाया नहीं गया 
कैसे बताये वो
 जिंन्दगी देकर भी 
उस शख्स से उसे
 अपनाया नहीं गया 
सूंदर घर, लायक बच्चे
 समाज में इज्ज़त
 और पूरी वफादारी 
नाकाफी लगी उसे 
शायद वो उसे
 मिटाना चाहता था 
लेकिन मिटाया नहीं गया 
बेइज्जती बेवफाई बेरुखी
 और गैर ज़िम्मेदारी  
सब कुछ किया उसने 
पर क्या कहूँ 
उससे हराया नहीं गया 
उससे हराया नहीं गया