244.दोहा

*मत समझो ये दिल्लगी, ह्रदय-लगी है "आग*"
*हिस्से आए बस जलन, ऐसा हैं अनुराग*
      ✍️सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️

ज़िन्दगी

ए ज़िन्दगी !  तेरे जाल में जो उलझा नहीं वो पार है
प्यार है मुझे बहुत ...........पर उलझने से इंकार है 
तू मुस्काती ज़रूर है....... पर बुरी क्यों लगती है तू
इसे ज़िंदादिली से नहीं जिया..तो ज़िन्दगी बेकार है 
             ✍️सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️

गुम

गुम कर दिया ख़ुद को मैंने तेरे लिए 
जी हमेशा तेरी मर्ज़ी, तेरी ख़ुशी के लिए 
तेरी बेरुखी दे रही है सिर्फ़ पछतावा 
क्यों किया, कैसे किया, मैंने किसके लिए
             ️✍️सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️ 

नया दिन

हर नया दिन है, एक नयी किताब 
भूल जा अतीत और उसके हिसाब 
लिख कुछ प्यारा,खूबसूरत सा दिल से 
हर हर्फ़ दे नयी ज़िन्दगी ज़नाब 
             ️✍️सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️