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दोहा.283

क्यों विधाता ने रचा, ये अद्भुत संसार जब जब बैठी सोचने, सदा मिली है हार ✍️ सीमा कौशिक ‘मुक्त’ ✍️

कशिश

ए रब !हमारी दिली कशिश यूँ ही बनी रहे ये चाहत,मुस्कुराहट,उर बगिया खिली रहे तुम जब भी आओ सामने,ए मेरे हमदम! हों पुरसुकून पल, हमारी रूह महकी रहे ✍️ सीमा कौशिक ‘मुक्त’ ✍️

शुरुआत

जहाँ से लोग ख़त्म करतें है वहाँ से हम शुरुआत करते हैं हम करके दिखाते हैं जिसकी अक्सर लोग बस बात करते हैं ✍️ सीमा कोशिक ‘मुक्त’ ✍️

फ़रिश्ते

कुछ लोग उस वक़्त आपकी ज़िन्दगी में आते है जब तुम्हें उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है वो आते हैं,तुम्हें चाहते हैं,सराहते हैं,ऊँचा उठाते हैं वो तुम्हें याद दिलाते हैं कि तुम तब भी सबसे बेहतर थे जब तुम ज़िन्दगी के भयानक दौर से गुजर रहे थे वो लोग सिर्फ तुम्हारे दोस्त नहीं,ज़मीन पे फ़रिश्ते…

ताज

तुम जीवित रहीं उस वक्त भी, जब तुम्हें लगा ,हालात तुम्हें मार डालेंगे तो अब क्या डर!चल अपना ताज सीधा कर और बढ़ आगे महारानी-सी ! ✍️ सीमा कौशिक ‘मुक्त’ ✍️ —– हिंदी अनुवाद ( quote by Dr munish jindal )