माँ दुर्गा

" आप सब जानते हैं माँ दुर्गा के बारे में
सच कहूं तो कुछ भी नया नहीं बता पाऊँगी 
पर आप सभी में स्थित माँ दुर्गा के अंश को मेरा नमन ! 
आज माँ को बस दिल से पुकारूँगी  "

हे दुर्गा माँ !नमन आपको !
दुर्गातिरशमनी कर दुःख शमन !  
शिव की शक्ति,बुद्धि रूपी,लक्ष्मी रूपी
माँ तुझे नमन !       
भक्तिरूपी शक्तिरुपी शांतिरूपी 
माँ तुझे नमन !
अपने आँचल की छाँव दे हमको  
प्यार कृपा से भर दे दामन !
हम सब तेरे चंचल बालक 
स्नेहपूर्ण तेरा अंतर्मन !
श्रद्धारूपी लक्ष्मीरूपी स्मृतिरुपी            
माँ तुझे नमन !
अंतर्यामी माँ मेरी तू 
जाने सबका अंदर बाहर !
माँ के प्यार बिना तरसे है 
चाहे जितना बड़ा हो बालक !  
तुष्टिरूपी दयारूपी मातृरूपी 
माँ तुझे नमन !   
जीवन के हर घर्षण में 
तुमको मेरा सब कुछ अर्पण !  
आत्म मुग्ध ना बनूँ कभी
देखूं हमेशा मैं मन दर्पण !
सर्वसुखदायिनी पापनिवारिणी 
हे दुर्गा माँ ! कोटि नमन ! 
कोटि कोटि नमन !

क्या हो तुम

रब /राम / परमात्मा /गॉड / कृष्ण ! क्या हो तुम !
तपती हुई रेत पर पानी की बूँद तुम 
जीवन की गर्म हवाओं में शीत पवन तुम 
हम सभी प्राणियों का भार सहती धरती तुम 
सभी के संरक्षक सर की छत आकाश तुम  
दिन भर के थकेहारे को सुकून भरी रात तुम 
घोर अंधियारे को चीरते हुए चाँद सितारे तुम 
अँधेरे को काटते उम्मीद की किरण लिए भोर का सूरज तुम 
लहलहाते खेत तुम बागों की बहार तुम 
मज़दूर का पसीना तुम ! किसानो की मेहनत तुम 
सैनिकों की वीरता तुम ! इंसानों की बुद्धि तुम 
माँ बाप गुरु तुम ! हर प्यार करनेवाला हाथ तुम 
हर मज़बूत बनानेवाला वार तुम ! वार भी, शत्रु भी तुम ! 
जीते जीते थक गए तो मौत की मीठी नींद तुम 
हो तुम कहाँ नहीं ! हर स्वास हर धड़कन में तुम 
अदृश्य भी दृश्य भी ! हो शाश्वत हर सत्य भी !
क्यों तुम्हें पुकारूँ मैं !वाणी की हो जब शक्ति तुम !
कुछ ऐसा करो परमपिता ! हो मुझ पर तेरी कृपा ! 
मैं कहीं भी ना रहूं ,रहो तो सिर्फ तुम ही तुम !

पहली किरण

आशियाँ बना नहीं उम्र सारी लग गयी  
पंछी  सारे उड़ गए वो ताकती रह गयी  
और कोई क्या साथ देता हमसफ़र तक नहीं 
उड़ान फिर भी बाकी है ! जान फिर भी बाकी है ! 
सुबह की पहली किरण कानों में कह गयी !!

मुस्कान

          होठों पर खुद ही मुस्कान सजानी होगी 
     रहे खुशियों के इंतज़ार में तो उम्र गंवानी होगी 
जश्न मना हर उस ख़ुशी का जो तेरे पास है,मुस्कुरा गम में भी !  
     मीठी सी मुस्कान से दूसरों की ख़ुशी बढ़ानी होगी

हर शख्स यहाँ ख़ास है

हर शख्स है कुछ अलग 
हर शख्स यहाँ ख़ास है 
फिर एक दूसरे से जलन है क्यों? 
दिल तेरा क्यों उदास है ?
कोई किसी के जैसा 
ना बना है, ना बनेगा!       
ये सिर्फ स्वार्थ या महत्वाकांक्षा 
की ही झूठी आस है
किसी को कुछ और है पसंद 
किसी को कुछ और रास है  
कोई है प्रकृति का प्रेमी   
कोई ऐश्वर्य का दास है  
किसी के पास कोई गुण
किसी के कोई हुनर पास है 
कोई करे साकार पूजा 
किसी को निराकार पे विश्वास है 
सृष्टि जो प्रभु रचित 
हर चीज़ इसमें ख़ास है 
जो लगता बुरा तुम्हें 
वो है अगर मौजूद !
कोई तो ज़रूरत है उसकी 
कोई तो राज़ है 
तू तो बस सबको प्रेमसे 
अपनाना सीख ले ! 
निर्णय देने,परखने का 
हक़ नहीं हमारे पास है  

नरक के द्वार

"तीन हैं नरक के द्वार
काम क्रोध और लोभ
जो करते हैं आत्मा का नाश!
इसलिए त्यागने योग्य हैं
जो मनुष्य है इनसे मुक्त वो अपने
कल्याण का आचरण कर
परमगति को प्राप्त होता है
मनमाना आचरण ना दे सिद्धि
ना सुख ,ना परमगति "
"कर्तव्य और अकर्तव्य की
व्यवस्था के लिए ही शास्त्र हैं
शास्त्रविधि से निर्धारित
कर्म ही करने योग्य हैं "

ऊर्जा स्त्रोत 1

भीड़ में अकेला बच्चा  परेशां सा खड़ा 
हार रहा है साथी बच्चों से 
अचानक माँ पर नज़र पड़ी 
चेहरा ख़ुशी से खिल गया 
जैसे ताकत का खज़ाना मिल गया
विश्वास से चेहरा दमकने लगा  
क्यूंकि वो अपने ऊर्जा स्त्रोत से मिल गया 
और हारने का डर दिल से निकल गया 
ठीक वैसे ही तू भी गर ब्रह्माण्ड 
अपने ऊर्जा स्त्रोत से मिल  गया
ज़िन्दगी चमत्कारों से भर जायेगी 
आत्मविश्वास ,असीमित संभावनाएं 
फूलों सा महकता जीवन जो होगा 
डर विहीन ,दर्दविहीन 
सम्मानित अपनी और दूसरों की नज़र में 

…के बाद

धरा पर मिली मुझे बस दो गज  की ज़मीन 
आसमान मेरा हुआ उड़ना सीखने के बाद......
दूरियां भी दूरियां ना रहीं, वो हरवक्त साथ ही रहने लगे 
दिल से उनको अपना मान लेने के बाद ......
साहब आजकल स्वार्थ का आलम है ये ,
आँखे सूखी ही रहती हैं दूसरों का दर्द सुन लेने के बाद .......
कितनी कसमें खाता है वो प्यार जब करता शुरू 
फिर भी करता बेवफाई प्यार मिल जाने के बाद ......
उसके अकेलेपन को आज महफ़िल मिले तो बात है 
क्या फायदा कसीदे पढ़ो उसके चले जाने के बाद ........
चाहे कितना भी पुकारो लौट कर आता नहीं 
चला जाये जहाँ से जो दिल टूट जाने के बाद......

	

भगवान का अस्तित्व

श्री कृष्ण ने गीता में कहा :
मुझ  निराकार परमात्मा से सारा  जगत
जल से बर्फ के समान परिपूर्ण है
सब मनुष्य मेरे अंतर्गत  
संकल्प शक्ति से हैं
पर वास्तव में मैं उनमे स्थित नहीं
किन्तु ये मेरी ईश्वरीय शक्ति है कि
प्राणियों को उत्त्पन्न करने वाला
भरणपोषण करने वाला होने पर भी
मेरी आत्मा प्राणियों में स्थित नहीं है
जैसे आकाश से उत्पन्न वायु
आकाश में ही है
वैसे ही मेरे संकल्प से उत्पन्न
सभी प्राणी मुझ में ही है