182.दोहा

*जाति धर्म का क्यों तुझे,  है इतना अभिमान* 
*मन चाहा मिलता नहीं, प्रभु-प्रदत्त तू जान* 
    ✍️ सीमा कौशिक'मुक्त'✍️

इज़हार

कैसा है ये प्यार जो, कर सके न इज़हार
ये शूरवीर ही करे, जो दिल से गुलज़ार
जो दिल से गुलज़ार, प्यार है  जिसका सच्चा 
प्यार सिर्फ है चाह, रहे बूढ़ा या बच्चा 
अपनाओ यदि प्यार, यार चाहे हो जैसा 
करे न जो इज़हार, प्यार है उसका कैसा

प्यारा

प्यारा तो बस प्यार है, है मनभावन गीत 
मधुर सुरीला गा इसे, सबका मन ले जीत
सबका मन ले जीत, प्यार है मधुर कहानी 
बोल न कड़वे बोल, सदा रख मीठी वानी
अपना हो हर शख़्स, लगे सबसे तू न्यारा  
बिन रिपु होते  प्राण, लगे है सबको प्यारा

फुलवारी

फुलवारी ये प्रेम की, जिसे कहे परिवार
प्यार आदर यकीन से, रहे सुदृढ़ आधार
रहे सुदृढ़ आधार, प्यार ही देना पाना 
आदर-औ-विश्वास, बिना इनके पछताना  
इन का डालो बीज, रहे रिश्तों में यारी  
सुखी रहे परिवार, सदा महके फुलवारी

दूरी

दूरी से भी हम रखें, इक दूजे का ध्यान
दुआ ह्रदय से हम करें, रखें प्यार का मान
रखें प्यार का मान, दर्द आओ जी बाँटें    
रब से जोड़ें हाथ, शूल दामन से छाँटें 
मदद अगर अरमान, पास होना न ज़रूरी 
रोज़ दुआएँ भेज, प्यार में कैसी दूरी

स्वार्थ

निज हित से ऊपर तकेँ ,ऐसे कम हैं लोग 
जो ऐसी कोशिश करें ,कहें लगा है रोग  
कहें लगा है रोग,रखो मतलब से मतलब 
काम नहीं है और, मौन बैठो सिलके लब 
रखो ह्रदय तुम साफ, करो मत उनको ख़ारिज  
जगहित की परवाह ,न सोचें वो स्वार्थ निज

पूर्ण

*अपनाओ तन-मन ह्रदय, पूर्ण प्रेम से पाग* 
*रिश्तों को नव मायने, रोज़ बढे अनुराग*
*रोज़ बढे अनुराग,प्रेम से कटे ज़िन्दगी*  
*करें अपूर्ण  प्रेम, लगे है एक दिल्लगी* 
*समझो जीवन सार, न अपना मन भरमाओ*   
*जीवन दो  उपहार , पूर्ण प्रिय को अपनाओ*

माँ

माँ से दूर जहान में, ख़ुशियाँ चाहे लाख 
आज़ादी भी है मगर, माँ के बिन सब राख 
माँ के बिन सब राख, रहे आनंद अधूरा 
उस के बिन हो भान, अधूरा सपना पूरा 
माँ चन्दन का पेड़, प्रेम होय दिलोजाँ से  
ज़िंदा हो तो जान, नहीं तो खुशबू माँ से

अहंकार

सब अवगुण की खान है, अहंकार ही मूल 
सब रिश्ते बिगड़ें तभी, ह्रदय चुभें तब शूल 
ह्रदय चुभें तब शूल , फिरें सब रूठे-रूठे 
दिल में पड़ती गाँठ, लगें सब रिश्ते झूठे 
तुम्हें पड़े न भान, दूरियाँ बढ़ जाएँ जब 
बढ़ती जाए रार, दूर होते अपने  सब