225.दोहा

*दर्द सहन से हो परे, नहीं प्रीत को प्रीत*
*कैसा मायाजाल ये, अजब जहाँ की रीत*।।
              ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️
 

ज़ख्म

दर्द उठता रहा ये ज़ख्म रिसते रहे 
हम तेरी आरज़ू में यूँ पिसते रहे 
हमको मर-मर के जीना रास आ गया 
वक़्त की सिल पे हम खुद को घिसते रहे 
          ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️