रास

यार ज़िन्दगी से छत्तीस का आंकड़ा मत रख 
प्यार कर, 'खुद' से बेवफाई रास न आएगी
              ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️ 

संग

हमने फूल ख़रीदे काँटे संग चले आये 
हँसने की चाहत में आँसू संग चले आये 
हमने रातभर करवटें बदली बेचैनी में 
दिलासा देने चाँद तारे संग चले आये 
              ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️ 

भेदभाव

भेदभाव जाति, धर्म का तो है ही समाज में, पर उससे बुरा है वर्गीय भेदभाव। 
समाज में ऊँचनीच पैसे, पद, प्रतिष्ठा के आधार पर । 
इसी पर कुछ पंक्तियाँ आपके सामने --- 

हर किसी को चाहिए 
अपने लिए लोकतंत्र 
अपने से नीचे वाले
 के लिए तानाशाही 
छोड़ दो वर्गीय भेदभाव
इंसानियत के लिए 
लोकतंत्र सबका अधिकार है ,
होना चाहिए  
लोकतंत्र शादी में रखा बुफे नहीं,
जितना मन में आया, खाया 
बाकी छोड़ दिया 
अपने ऊपर से सम्मान चाहो 
तो नीचे पहले दो 

आत्मज्योत

ज्ञान के जगमग दीप जलें, शांति-संयम की बाती  
हम सब मनाएँ जीवन उत्सव, प्यार ही इसकी थाती  
रूठे हुओं को अपना बनाएँ, सुंदर प्रेम के दीप जलाएं   
साफ़ रखें मन का दर्पण, आत्मज्योत तभी जल पाती 
               ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️ 

सर्जन(surgeon)

 बहुत शानदार सर्जन के लिए ये चार पंक्तियाँ रख रही हूँ, 
जो तन का ही नहीं मन का इलाज़ करना भी जानते हैं, मीठे व्यवहार से । 
काश ऐसे मन के सर्जन भी हों....

जाने कैसे सुईं-धागे से ज़ख्मों को सीता रहा
अपनी मीठी बातों से दूजे के गम पीता रहा 
वो तो पूरे होश में भी नहीं, किया दर्द से ज़ुदा 
निशाँ छोड़ छुप कर उनकी यादों में जीता रहा 
            ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️ 

निःशब्द

निःशब्द तेरी जब आँखों में देखा 
प्यार का समंदर लहराते देखा 
हम समंदर में कुछ इसतरह डूबे 
हमने नहीं कभी फिर  मुड़कर देखा  
              ✍️सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️ 

अदा

कभी जब नज़र भर के हमें वो देख लेते हैं  
हम शरमाये से उनसे नज़र फेर  लेते हैं 
हमारी इस अदा पे भी, हैं फ़िदा मेरे हमदम 
बुनते हैं ख़्वाब कईं ,ख़्याल उन्हें घेर लेते हैं 
               ✍️ सीमा कौशिक 'मुक्त' ✍️