चुनावों का मौसम

ए काव्य मन ! तेरी कलम ना हो राजनीति से प्रेरित  
है चुनावों का मौसम  !
तेरे ज्ञान की कुल्हाड़ी से तेरी शाख ही ना कट जाए 
है चुनावों का मौसम  ! 
तू तो है मानव संवेदनाओं भावनाओं से जुड़ा हुआ 
तेरा हर गीत प्रेम अपनेपन से था गुँथा हुआ 
भ्रमित भी हो सकता है तू! इस बात का विचार कर
संभल ! झूठ सच का कॉकटेल समाज में मिला हुआ  
यहाँ  है चुनावों का मौसम  !
सरकारें आयी गयी, स्थिति कमोबेश एक सी !
गरीब और गरीब ! अमीर और अमीर हो गया ! 
ना जाने प्यार भाईचारा विश्वास कहाँ खो गया ? 
कड़वा ना बोले था कभी जो! बातें करे ज़हर सी !
सुन ! है चुनावों का मौसम !
देख सड़कों पे है जो हममे से एक! तुझसा मुझसा ही तो है!
हर नुकसान कुर्बानी होती हमेशा उसी की  है 
तू तो बस जनता को सही राह दिखा ! गर हो सके! 
चयन करना अधिकार उसका ! समझ उसकी अपनी भी है   
ठीक है ना ! है चुनावों का मौसम !

खोज

प्यार पैसा दौलत शोहरत  
उन्नति प्रगति सफलता 
बरकत बढ़ोतरी और बहुत कुछ  
पाने की होड़ जारी है 
खुद को भुला कर दुनिया 
पाने की दौड़ जारी है
इंसान कब इंसान हो 
जागे उसका ईमान जो 
सही गलत अच्छे बुरे की 
सही उसे पहचान हो 
अपने साथ सभी के लिए सोचे  
ऐसी इंसानियत की खोज जारी है 

मिट्टी

चाहे तू या मैं ! 
सब कुछ मिट्टी ही है ! 
मिट्टी में रहता है 
मिट्टी ही चाहता है 
मिट्टी ही पाता है 
मिट्टी संजोता है 
मिट्टी ही खोता है 
फिर भी सबको कुछ कुछ समझता
हँसता और रोता है
सुन !कितना भी उड़ें हम ! 
यहाँ सब कुछ मिट्टी में ज़ज़्ब होता है !

सजावट

फूलों की तरह महकते रहें आप 
सितारों की तरह चमकते रहें आप  
ईश्वर की कृपा से मिली है ज़िन्दगी 
इंसानियत से उसको सजाते रहें आप  

दुआ

फूल खिलते रहें आपकी राह में 
हंसी चमकती रहे आपकी निगाह में 
कदम कदम पर मिले ख़ुशी की बहार आपको 
दिल मांगता है बार बार यही रब से दुआओं में 

ज़रूरत

ज़रूरी नहीं ज्ञान ही सिखाता है आपको   
दुःख परेशानी भी सिखाती है कभी
सोकर उठना ही ज़रूरी नहीं आँख खोलने को 
अज्ञानता अशिक्षा भी आँखें खोलती है कभी   
जो भी मिला सुख दुःख, पलकों पे उठा ले 
ज़रूरी था, इसीलिए तराशने को आया कभी कभी 
सिर्फ जुबां का मीठा होना ज़रूरी नहीं !
साधो मन वाणी विचार व्यवहार सभी
प्यार खुशियां अपनापन बांटो सबको 
कोई करे न करे! तुम तो अपनी मुट्ठी खोलो कभी 
सच्चे आदमी की कीमत कभी कम नहीं होगी  
बेईमान को भी सच्चे की ज़रूरत हमेशा पड़ी !
आज ही करले जो है तुझे करना 
क्या पता जाना पड़े अगली घडी !          

मुस्कान

होठों से ही नहीं आँखों से मुस्कुराइए  
दिमाग से नहीं, कभी दिल की भी बतलाइये 
मैंने तो साँसें भी की तुम्हारे नाम ! 
तुम्हारा दिन कहाँ गुजरा,कुछ तो बताइये 

बेचैन

वो हमसे उम्मीदों का सिलसिला टूटने नहीं देते !
रूठे तो बहुत हैं उनसे हम ! मगर दामन छूटने नहीं देते !
चैन नहीं उनको हमसे बिछड़कर एक पल भी !
हम भी बेचैन से , अगर वो आवाज़  नहीं देते !

बेख्याली

हर दर्द हर बात नज़र अंदाज़ करने वालों 
आएगा वक़्त!
तुम्हें भी नज़रअंदाज़ किया जाएगा 
दूसरों के दर्द से नज़रें चुराने वालों ! 
रूह तड़पेगी तुम्हारी भी !
तुमसे भी हर बेख्याली का हिसाब लिया जाएगा